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पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था
January 31, 2020 • - प्रदीप कुमार सिंह

मानवीय कार्य से निर्मित आपदा लापरवाही, भूल या व्यवस्था की असफलता मानव-निर्मित आपदा कही जाती है। मानव निर्मित आपदा तकनीकी या सामाजिक कहे जाते हैं। तकनीकी आपदा तकनीक की असफलता के परिणाम हैं। जैसे - इंजीनियरिंग असफलता, यातायात आपदा या पर्यावरण आपदा, ब्लैक होल्स आदि। सामाजिक आपदा की श्रेणी में आपराधिक क्रिया, भगदड़, दंगा और युद्ध आदि आते हैं। मानव को प्राकृतिक आपदा का सामना प्राचीन काल से ही करना पड़ रहा है। अपनी विशिष्ट भू-जलवायु के चलते परंपरागत रूप से भारत का एक बड़ा क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के दृष्टि से अति संवेदनशील रहा है। इसके अलावा बड़ी दुर्घटनाएं भी कई बार आपदा का रूप ले लेती हैं। बीस सालों में आपदाएं पांच गुना बढ़ी हैं। सरकार को इसके लिए जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में आपदाओं के प्रति वैश्विक स्तर पर 
प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़़ी है। हाल ही में शासन तथा प्रशासन की ओर से पर्याप्त जल निकासी का उचित प्रबन्ध न होने के कारण पटना शहर सहित देश के अनेकों शहरों में जलभराव से नागरिकों को भारी कष्ट उठाना पड़ा है। अभी भी उसके दुप्रभाव से लोग जूझ रहे हैं। 
 संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिवर्ष 13 अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा कटौती दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गयी है। इस दिवस का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच प्राकृतिक आपदा के समय एक-दूसरे देश के बीच सहयोग, शान्ति तथा सहायता को बढ़ावा देना तथा प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरों की संख्या में कटौती करने के लिए सार्थक कदम उठाने के लिए नागरिकों को प्रेरित करना है। यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेन्ट प्रोग्राम इसमें अह्म भूमिका निभा रहा है। धरती पर पलने वाले मानव जीवन सहित समस्त जीवों के ऊपर अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, तृतीय विश्व की आशंका, परमाणु शस्त्र बनाने की होड़, ग्लोबल वार्मिंग, ओजन परत का क्षरण, प्रौद्योगिकी का दुरूपयोग, तेल संकट, अत्यधिक जनसंख्या, सुपरवोल्केनो, उल्का प्रभाव, हिम युग, वृहत सुनामी, आकाल, भूकंप, मरूस्थलीकरण, प्रकृति का अनियंत्रित तथा अत्यधिक उपभोग, सूखा, बाढ़, जल संकट, वनों की कटाई आदि का सदैव संकट मंडराता रहता है। 
 प्राकृतिक आपदा एक स्वाभाविक परिणाम है (जैसे ज्वालामुखी विस्फोट या भूकंप) जो मनुष्य को प्रभावित करते हैं। वर्तमान वैश्विक युग में अधिकांश समस्याऐं विश्वव्यापी स्वरूप धारण कर चुकी हैं। एक देश में किसी प्रकार की आपदा या संकट आने पर उसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है क्योंकि आज एक देश का उत्पादन आवागमन की सुविधा तथा संचार-सूचना तकनीक के विकास के कारण एक देश से दूसरे देश में आसानी से तथा शीघ्रता से आ-जा रहा है। उदाहरण के लिए खाड़ी देशों में तेल का संकट आने पर तेल की बढ़ी कीमतों का प्रभाव विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के जेब पर पड़ता है।
 संयुक्त राष्ट्र की एक वैज्ञानिक समिति के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव बेकाबू हो सकता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती की गर्मी को वायुमंडल में अवरूद्ध कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल का तापमान बढ़ जाता है और ऋतुचक्र में बदलाव देखे जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र पचैरी ने एक रिर्पोट जारी की है। पचैरी ने इस रिर्पोट के द्वारा बताया है कि अब चर्चायें करने का समय बीत चुका है अब सत्र्थक कार्रवाई की जानी चाहिए। श्री पचैरी ने कहा कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के दल द्वारा तैयार रिर्पोट में कहा गया है कि यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने यह दिखा दिया है कि मानवता के लिए मौसम का खतरा कितना बड़ा है। रिर्पोट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक बढ़ा तो खतरा और बढ़ जाएगा।
 विगत वर्षों में गरीब कैरेबियन देशों में एक हैती तथा अमेरिका में मैथ्यू तूफान के विनाश ने कहर बरसाया था। उत्तराखण्ड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा, जापान के पिछले 140 सालों के इतिहास में आए सबसे भीषण 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप की वजह से प्रशांत महासागर में आई सुनामी के साथ ही यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान तथा भारत के केरल प्रान्त में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने सारे विश्व का ध्यान विनाशकारी समस्या की ओर आकर्षित किया है। कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह श्री जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनियाँ के निवासियों ने एकजुट होकर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अन्त तक अरबों की विशाल संख्या में व्यक्ति मारे जायेंगे। संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानव जाति को हलके से नहीं लेना चाहिए। 
 आज जब दक्षिण अमेरिका में जंगल कटते हैं तो उससे भारत का मानसून प्रभावित होता है। इस प्रकार प्रकृति का कहर किसी देश की सीमाओं को नहीं जानती। वह किसी धर्म किसी जाति व किसी देश व उसमें रहने वाले नागरिकों को पहचानती भी नहीं। वास्तव में आज पूरे विश्व के जलवायु में होने वाले परिवर्तन मनुष्यों के द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। परमात्मा द्वारा मानव को दिया अमूल्य वरदान है पृथ्वी, लेकिन चिरकाल से मानव उसका दोहन कर रहा है। पेड़ों को काटकर, नाभिकीय यंत्रों का परीक्षण कर वह भयंकर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है। जिस पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था आज वहीं अभिशाप बनता जा रहा है।  
 भारत में भी सरकार ने आपदा प्रबंधन पर नीतिगत ढांचा तैयार किया है। इसके बाद से इसमें व्यवस्थित तौर पर रोजगार पैदा हुआ है। सरकार, एनजीओ, अनेक निजी संस्थान आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में प्रशिक्षित व्यक्तियों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। इन संकटों के कारण विश्व में व्याप्त असुरक्षा की भावना को ध्यान में रखते हुए अब समय आ गया है कि इन संकटों से निपटने के लिए हम स्वयं को तैयार रखें। आपदा प्रबन्धन में भविष्य में उत्पन्न होने वाले विभिन्न खतरों, उनसे बचाव के पूर्व उपायों और उनका सामना करने के लिए पहले से तैयार रहने की आवश्यकता पर जोर दिया जाना चाहिए। इन उपायों में ऐसे ढांचागत और गैर-ढांचागत उपाय करने पर भी विशेष रूप से ध्यान जाना चाहिए जो ऐसी आपदाओं का सामना करने के लिए जरूरी हैं। 
 डिजास्टर मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स का मुख्य काम आपदा के शिकार लोगों की जान बचाना और उन्हें मुख्य धारा में फिर से वापस लाना होता है। इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारे आवश्यक धन उपलब्ध कराती हैं। इन सबमें मुख्य सरकारी एजेंसी के रूप में गृह मंत्रालय बड़ी भूमिका निभाता है। वह आपदा के समय डिजास्टर मैनेजमेंट का कार्य संभालता है। कृषि एवं सहकारिता मंत्रालय सूखे और अकाल के वक्त अपनी जिम्मेदारियाँ निभाता है। वहीं, अन्य विपदाओं के लिए दूसरे मंत्रालय भी जिम्मेदार होते हैं, जैसे- हवाई दुर्घटनाओं के लिए सिविल एविएशन मिनिस्ट्री, रेल दुर्घटनाओं के लिए रेल मंत्रालय, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा मंत्रालय आदि भी विभिन्न प्रकार की विपदाओं के समय जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। डिजास्टर मैनेजमेंट में प्रशिक्षित लोग आपदा के वक्त बहुमूल्य होते हैं। ट्रेनिंग के दौरान स्टूडेंट्स को आपातकालीन स्थितियों में प्रबंधन के बारे में ट्रेंड किया जाता है। भारत की तीनों सेनाओं, अग्निशमन दल, पुलिस आदि की भी आपदाओं से लोगों को सुरक्षित निकालने तथा उनका जीवन बचाने में अह्म भूमिका होती है।  
 भारत सरकार ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल की है। मानव संसाधन मंत्रालय ने डिजास्टर मैनेजमेंट को स्कूल और प्रोफेशनल एजुकेशन में शामिल किया था। पहली बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने आठवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान विषय के पाठयक्रम में इसे शामिल किया है। इसके बाद आगे की कक्षाओं में और सरकारी व गैर सरकारी उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में भी डिजास्टर मैनेजमेंट की पढ़ाई होने लगी है। सर्टिफिकेट कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता बारहवीं पास है, जबकि मास्टर डिग्री या पीजी डिप्लोमा के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक है। इस कोर्स में एडमिशन लेने वालों में हर परिस्थिति में काम करने का जज्बा जरूर होना चाहिए। कुछ संस्थान प्रोफेशनल्स के लिए भी सर्टिफिकेट कोर्स चलाते हैं। 
 हमारा अध्यापकों से अनुरोध है कि वे विद्यार्थियों को पढ़ाते समय आपदा प्रबन्धन से जुड़ी जानकारियों का उपयोग करें। आपदा प्रबंधन विषय को बेहतर ढंग से समझने के लिए उनका अध्ययन काफी महत्वपूर्ण है। बाल एवं युवा पीढ़ी ही विश्व के भावी नागरिक, स्वयं सेवक और आपदा प्रबंधक भी है। उन्हें आपदाओं का सामना करने में समर्थ बनने के साथ-साथ बेहतर आपदा प्रबंधक भी बनना है और मानव जाति के अत्यन्त उपयोगी जान-माल की रक्षा करनी है। आपदा प्रबन्धन को एक विषय के रूप में बल्कि एक अनिवार्य जीवन रक्षा कौशल के रूप में भी इस विषय को स्कूलों में लागू करने का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। साथ ही स्कूल भवनों से बाहर जाकर माता-पिता और समुदाय में भी जागरूकता पैदा करने का प्रयास करना चाहिए।
 प्राकृतिक आपदाओं ने वर्तमान में वैश्विक रूप धारण कर लिया है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जान टिम्बरजेन ने कहा है कि राष्ट्रीय सरकारे विश्व के समक्ष उपस्थित संकटों और समस्याओं का हल अधिक समय तक नहीं कर पायेंगी। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्व संसद आवश्यक है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ को मजबूती प्रदान करके प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए प्रभावशाली वैश्विक प्रशासन के लिए भारत को आगे बढ़कर संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रजातांत्रिक एवं शक्तिशाली बनाकर विश्व संसद का स्वरूप प्रदान करने की अगुवायी करनी चाहिए। एक वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था का गठन होने से हम प्राकृतिक आपदाओं से काफी हद निपटने में सफल हो सकते हैं। सुरक्षा के नाम पर खर्च होने वाली विशाल धनराशि तथा सबसे मजबूत मानव संसाधन को हम विश्व सरकार का गठन करके समझदारीपूर्वक बचा सकते हैं। इस बचत की धनराशि तथा सबसे अमूल्यवान मानव संसाधन को प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में त्वरित गति से लगा सकते हैं। विश्व सरकार के गठन ेसे प्रत्येक व्यक्ति का दर्जा विश्व नागरिक का हो जायेगा। उसे धरती में किसी भी सुरक्षित जगह में निवास का अधिकार हो जायेगा। संसार के अभी भारी संख्या में लोग खतरनाक जगहों पर आर्थिक कारणों तथा प्रतिबन्धों के कारण रहने के लिए विवश है।  
 मानव जाति को अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, तृतीय विश्व की आशंका, परमाणु शस्त्र बनाने की होड़, ग्लोबल वार्मिंग, ओजन परत का क्षरण, प्रौद्योगिकी का दुरूपयोग, तेल संकट, अत्यधिक जनसंख्या, सुपरवोल्केनो, उल्का प्रभाव, हिम युग, वृहत सुनामी, आकाल, भूकंप, मरूस्थलीकरण, प्रकृति का अनियंत्रित तथा अत्यधिक उपभोग, सूखा, बाढ़, जल संकट, वनों की कटाई आदि सेे बहुत हद तक बचाया जा सकता है। महान विचारक विक्टर ह्नयूगो ने कहा है कि ‘‘इस दुनियाँ में जितनी भी सैन्यशक्ति है उससे कहीं अधिक शक्तिशाली वह एक विचार होता है जिसका कि समय अब आ गया हो।’’ विश्व परिवर्तन मिशन के संस्थापक विश्वात्मा भरत गांधी का मानना है कि आज के युग में वोटरशिप योजना वह विचार है जिसका समय अब आ गया है। प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों को अपने तथा परिवार के जीवन को पुनः पटरी पर लाने में वोटरशिप योजना काफी हद तक कारगर हो सकती है। वोटरशिप योजना को वर्तमान में सर्व स्वीकारता के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इस बारे में अधिक जानने के इच्छुक व्यक्ति यूट्यूब में जाकर वोटरशिप भरत गांधी सर्च करके वीडियो देख सकते हैं।