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राहू का ग्रहों पर प्रभाव
December 12, 2019 • विमल मेहता • Astrology

मनुष्य के जीवन में राहू का भी महत्व रहता है, ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के अनुसार ही किसी भी व्यक्ति की किस्मत बनती है और बिगड़ती भी है। ज्योतिष में कुल 9 ग्रह होते हैं। ज्योतिष में कुंडली में इन सभी ग्रहों की स्थिति से व्यक्ति का भाग्य पर अपना प्रभाव दिखता है। 9 ग्रहों में दो ग्रह राहु और केतु ऐसे ग्रह है जिसे अशुभ माना जाता है। लेकिन राहू का ऐसा भी प्रभाव होता है। जाने कि राहू की अन्य ग्रहों से युति से व्यक्ति को कैसा फल प्राप्त होता है।
 ऐसी मान्यता है कि असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है। इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ याम वर्णी कुत्तों द्वारा खींचा जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है। दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त 24 मिनट की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है। समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी थी। इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, भगवान विष्णु ने उसका गला सुदर्शन चक्र से काट कर अलग कर दिया। परंतु तब तक उसका सिर अमर हो चुका था। यही सिर राहु और धड़ केतु ग्रह बना और सूर्य-चंद्रमा से इसी कारण द्वेष रखता है। इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है। ग्रहण करने के पश्चात सूर्य राहु से और चंद्र केतु से, उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं।
 ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में 180 डिग्री पर स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहू और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है। इसी कारण पूर्णिमा के समय यदि चाँद राहू (अथवा केतु) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दूसरे के उलटी दिषा में होते हैं। ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू।
 राहु पौराणिक संदर्भों से धोखेबाजों, सुखार्थियों, विदेशी भूमि में संपदा विक्रेताओं, ड्रग विक्रेताओं, विष व्यापारियों, निष्ठाहीन और अनैतिक कृत्यों, आदि का प्रतीक रहा है। यह अधार्मिक व्यक्ति, निर्वासित, कठोर भाषण कर्त्ताओं, झूठी बातें करने वाले, मलिन लोगों का द्योतक भी रहा है। इसके द्वारा पेट में अल्सर, हड्डियों और स्थानांतरगमन की समस्याएं आती हैं। राहु व्यक्ति के शक्तिवर्धन, शत्रुओं को मित्र बनाने में महत्वपूर्ण रूप से सहायक रहता है।
- ज्योतिष के अनुसार जातक की कुंडली में शनि के साथ राहु स्थित हो तो वह व्यक्ति बहुत ही शांत और रहस्यमयी स्वभाव का होता है। ऐसे लोग अपनी क्षमता से ज्यादा धन और संपदा एकत्र करते हैं।
- जातक की कुंडली में शनि, शुक्र और बुध लग्न भाव के स्वामी हैं तो राहु शुभ फल दे सकता है। राहु इन ग्रहों का मित्र है।
- जातक की कुंडली में अगर सूर्य, चंद्र, मंगल या चंद्रमा लग्न भाव के स्वामी हैं तो राहु से अशुभ फल मिल सकते हैं। राहु का इन चारों ग्रहों के साथ शत्रुता है।
- जातक की कुंडली में यदि राहू तृतीय, षष्ठम और एकादश भाव में है तो व्यक्ति के लिए राहु शुभ होता है।
- जातक की कुंडली में राहु लग्न, पंचम, नवम, दशम में सामान्य फल देता है।