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रोजा रखने का महत्व
November 18, 2019 • गौसिया तरन्नुम

इस्लाम में रमजान के महीने को सबसे पाक महीना माना जाता है। मुसलमानों के लिये रमजान के महीने का बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, इस माह में हर सच्चा मुसलमान अल्लाह की इबादत करता है और उसके बनाये हुये नियमों का पालन करने की कोशिश करता है, जो कि हर मुसलमान व्यक्ति को करनी चाहिये। चाहे वो पुरुष हो या महिला, रोजा हर मुसलमान पर फर्ज है किसी भी हालत में रोजे को नहीं छोड़ा जा सकता है। इस महीने अल्लाह अपनी रहमत की बारिश करता है और हर इन्सान की इतनी कुव्वत और ताकत देता है कि वो पूरे दिन के रोजे को पूरे ,हतराम के साथ रख सके। रमजान के दौरान मुसलमान रोजा रखते हैं और इबादत में वक्त गुजारते हैं। इबादत के दूसरे तरीकों की तरह रोजा भी एक बाहरी रूप है जिसे हम जानते हैं। जो रोजा रखते हैं लेकिन गलत काम करते हैं वे रमजान के दौरान रोजा रखने का महत्व नहीं समझते। मुहम्मद साहब ने कहा है कि ऐसा करने वालों को सिर्फ भूख और प्यास ही मिलती है। इस महीने में रोजे रखना सभी बालिग और स्वस्थ्य लोगों के लिए वाजिब (अनिवार्य) बताया गया है। बीमार, बूढ़े, सफर कर रहे लोगों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माओं को रोजे रखने या ना रखने की आजादी दी गई है। रोजा सिर्फ इस बात का नही होता है कि सुबह फ़ज्र के वक्त से मगरिब की अजान तक कुछ खायें ना बल्कि रोज़ा हमारे पूरे जिस्म (शरीर) का होता है, हम किसी की बुराई न करें, क्योंकि हमारा मुँह का रोजा होता है, आँख से गलत न देखें, उसका भी रोजा होता है, रमजान के महीने में जितना जिससे हो सके वो गरीबों, यतीमों, बेरोजगारों और जितने भी बेसहारा और जिन्हे मदद की जरूरत है, उन्हें हमें कुछ तक्सीम करते रहना चाहिये। ये हमारा फ़र्ज है इस महीने में अल्लाह अपनी नेमत बरसाता रहता है, अल्लाह देने देने वालों को और ज्यादा देता है। रमजान के महीने में हर मुसलमान जो हैसियत रखता है उसे गरीब, बेसहारा, यतीमों को फ़ितरा और ज़कात देना चाहिये, उसके ऊपर फ़र्ज है, इस महीने में अगर आप 1 रुपये खर्च करेंगे तो अल्लाह आपको 70 रुपये नेकिया देता हैं। रमजान इबादत और रहमतों का महीना है अल्लाह अपने बन्दों पर रहमत और बरकतों की बारि”ा करता है, हर मुसलमान को चाहिये की वो सच्चे दिल से रोज़ा रखे, नमाज़ पढ़े, कुरआन की तिलावत करे, अल्लाह अपना रहम और करम फरमायगा। 10 साल की उम्र से हर बच्चे पर रोजा फर्ज़ है, रोजा किसी भी तरह छोड़ना नही चाहिये ,क रोज़ा छोड़ने पर बहुत बड़ा गुनाह जिसने 1 रोजा छोड़ा वो अल्लाह और बरकतों से महरूम रह गया।
 हर मुसलमान के लिए जकात देना भी इस्लाम में वाजिब (फर्ज) बताया गया है। जकात उस पैसे को कहते हैं जो अपनी कमाई से निकाल कर खुदा की राह में खर्च किया जा,। इस पैसे का इस्तेमाल समाज के गरीब तबके की सेवा के लि, किया जाता है।
 मान्यता है कि जकात रमजान के महीने में बीच में ही दे देनी चाहि, ताकि इस महिने के बाद आने वाली ईद पर गरीबों तक यह पहुंच सके और वह भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें। रमजान के अगले महिने की पहली तारीख को ईद का त्यौहार मनाया जाता है।