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सार्थक विचार
January 19, 2020 • अनीता सहगल

जीवन वह शब्द है जिसकी अभिलाषा हर सजीव वस्तु को होती है। उसको जीवन पाने की लालसा, पिपासा को कोई अभी तक शान्त नहीं कर पाया है, क्यांेकि व्यक्ति का जीवन वह आधा भरा गिलास है जिसे देखने का नजरिया हर किसी का अलग-अलग होता है। कोई कहता है गिलास आधा खाली है। हर तरह के विचारों वाला व्यक्ति अपने जीवन को हिसाब से जीता है क्योंकि व्यक्ति का जीवन एक संघर्षमय जीवन होता है भले ही व्यक्ति इस बात को मानता है अथवा नहीं, यह उसके ऊपर निर्भर करता है। इसलिए कितने व्यक्तियों ने विभिन्न प्रकार की इस जीवन शैली की परिभाषा अपने-अपने मतानुसार दी। किसी ने इसे एक रंगमंच कहा, तो किसी ने बहता पानी। किसी के लिए कर्मभूमि बना तो किसी के लिए मोक्ष पाने पहली सीढ़ी, पर कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि जीवन में खुशियाँ कम और परेशानियाँ अधिक होती है और यह जानते हुए कि कठिनाइयाँ हमारे जीवन का एक हिस्सा है। इंसान को एक बात हमेशा अपने जीवन की परिभाषा में शामिल कर लेना चाहिए कि कठिनाइयों से ही किसी कठिनाई को हल किया जा सकता है क्योंकि जिन्दगी में अगर चुनौतियाँ नहीं होती तो जीवन जीने का मजा ही अधूरा हो जाता ऐसा महान लोगों का कहना है। मंजिलें कठिनाइयों को पार करने का नाम है ना कि रूक जाने का।
 कुछ लोग अपनी आंखे इस सच्चाई की तरफ मूंद लेते हैं। ऐसे लोगों को कभी आप प्रार्थना करते हुए सुनिए वे ईश्वर से यही प्रार्थना करते हुए मिलेंगे कि हे प्रभु हम पर कभी भी कोई मुसीबत न आए, हमारे सामने कोई चुनौती न खड़ी हों, हमें हर समस्या से छुटकारा मिले आदि। लेकिन यह सोच एकदम गलत है। सच्चाई इसके विपरीत है, जीवन एक संघर्ष है और कठिनाइयाँ इसका जरूरी अंग। हम जब भी प्रर्थाना करें या इबादत करें या ईश्वर से कोई वरदान मांगे तो यही मांगे कि मुसीबत चाहे कैसी भी आए, समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हे भगवान हमको शक्ति देना सामना करने की, हमकों काबिलियत देना उससे निपटने की, हमको हौसला देना उस मुसीबत को हराकर कामयाब होने की। संघर्ष में ही जीवन का सत्य छिपा है।
 एक प्राचीन कथा में युवक ने सुना, भगवान सबको रोटी देते हैं। युवक को बात जंच गई, उसने काम बन्द कर दिया, जो पूछता यही उत्तर देता कि भगवान जब रोटी देने ही वाले हैं तो मेहनत क्यों करू? एक ज्ञानी उधर से निकले, मतिभ्रम ग्रस्त लड़के की हालत समझी और उसे प्यार से दूसरे दिन सवेरे उसे अपने पास बुलाया और कुछ उपहार देने को कहा। युवक भावुक था, सबेरे ही पहंच गया। ज्ञानी ने पूछा, कैसे आए? उसने उत्तर दिया, पैरों से चलकर। ज्ञानी ने उसे मिठाई उपहार में दी और कहा, तुम पैरों से चलकर मेरे पास तक आये, तभी मिठाई पा सके। ईश्वर रोटी देता तो है जो हाथ पैरों के पुरूषार्थ से उसे कमाने और पाने के लिए चलता है। जब मेरी मिठाई तुम बिना पैरों से चले प्राप्त नहीं कर सके तो भगवान द्वारा दी जाने वाली रोटी केसे प्राप्त कर सकोगे। तब युवक को अपनी भूल का अहसास हुआ।
 इस दुनियाँ में जीवन उसी का सार्थक, जिसके पास सार्थक विचार हों और जिसने दुनियां में सबसे सर्वोत्तम कार्य किए हों। भावहीन, विचारहीन और कर्महीन जीवन के सौ साल, कर्मठ जीवन के पल-पल के आगे बेकार है। मुश्किलों में आगे बढ़कर दुनिया के सामने अपनी योग्यता को सिद्ध करने का नाम ही जीवन है। एक बेजुबान पेड़ से हम प्रेरणा ले सकते है लेकिन अपने साए में बैठने वालों को शीतल छाया देता है। जीवन  ही वही है जो दूसरों के काम आए क्योंकि अपने लिए तो सिर्फ जानवर जीता है। मनुष्य में शक्ति की कमी नहीं होती, संकल्प की कमी होती है।