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सभ्यता और संस्कृति कभी न भूलें
January 30, 2020 • रत्ना मिश्रा • Views

पुराने माहौल में जब देश में एमबीए, बीटेक, एमसीए जैसे गिने चुने डिग्री धारको के हाथों-हाथ लिया जाता था। इन डिग्रीयों के बगैर आपको कोई नामलेवा भी नही मिलेगा। इसलिए समय के मुताबिक आजों के युवाओं ने अपने आप ढाला और ढाल रहे है।
 देश में इन दिनों कम्प्यूटर- आईटी सेक्टर, हैवी इंडस्ट्री व दूसरी माल इंडस्ट्री में ऐसे ही लोगांे की जरूरत है जो अपने काम से देश की अर्थव्यवस्था को और बेहतर बनाने में अपना सहयोग दे सकें।
 कुछ कारणवश आज भी बहुत से ऐसे लोग है जो रेगुलर क्लासेज, ऊँची-ऊँची फीस की वजह से उनकी पढ़ाई में बड़ी चुनौतियाँ आती थी लेकिन इसका बहुत अच्छा विकल्प निकला ‘‘करेस्पान्डेन्स या डिस्टेंस ऐजुकेशन‘‘ जिसमें न रेगुलर क्लास की जरूरत ना बड़ी-बड़ी फीस का खर्च।
 देश के कई यूनिवर्सिटी इस क्षेत्र में लगभग सभी विषयों में कोर्स आॅफर करती है तो कुछ अपना किसी खास विषय में स्पेशलाइजेश। इसी में बहुत ही जाना पहचाना नाम बन चुका ‘‘इग्नू‘‘ इन्होने अपने 77 से ज्यादा ऐकेडमिक, प्रोफेशनल, अवरनेय जेनरेटिंग प्रोग्राम के जरिये देश के लाखों छात्रों को लाभान्वित कर रहा है।
 शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के प्रयास को देखकर खुशी होती है स्वतंत्र भारत के कर्णधारों, हमारे महापुरूषों ने भी शिक्षा के साथ जुड़ी रहने वाली एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी को हमेशा ध्यान में रखा वह है अनुशासन और शिक्षा के साथ दीक्षा भी हो-
 ‘‘ शिक्षा अनुशासन की पूर्णता है तो दीक्षा बुद्धिमत्ता के आकाश के अंत तक पूर्णता पहुचाने की प्रक्रिया है। बिना शिक्षा और दीक्षा के मनुष्य पूर्ण नही बन सकता।‘‘ जीवन में आने वाली समस्याओं से विद्यार्थी जो भविष्य का नागरिक है तभी वह हर परिस्थिति का सामना कर सकता है जब उसकी शिक्षा के साथ दीक्षा, विद्या सुंस्कारिता का समावेश हो। हम बहुत आगे बढ़े खूब पढ़ंे लेकिन भारत की जो पहचान है यहाँ की सभ्यता और संस्कृति इसको कभी न भूलें।
 स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि ‘‘वर्तमान समय में हम कितने ही राष्ट्रों के विषय में जानते है, जिनके पास विशाल ज्ञान का भण्डार है, परन्तु इससे क्या वाद्य के समान नृशंस है, बर्बरों के समान है क्योंकि उसका ज्ञान संस्कार में परिणत नही हुआ है। सभ्यता की तरह ज्ञान भी चमड़े की ऊपरी सतह तक सीमित है, छिछला है और खरांेच लगते ही नृशंस रूप् से जाग उठता है हमें अपने विशाल राष्ट्र के लिए ऐसी शिक्षा नीति बनानी होगी, जिसमें शिक्षा और विद्या सभ्यता  और संस्कृति का सचमुच मेल हो।
 जहाँ शिक्षा और शिक्षाक्षेत्र से जुड़े विषयों पर इतनी बातें हो और वहाँ डाॅ0सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम न आयें ऐसा नही हो सकता।
 डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडु के पवित्र तीर्थस्थल तिरूतनी ग्राम में हुआ था। राधाकृष्णन की पढ़ाई क्रिश्चयन मिशनरी संस्था लूथर मिशन स्कूल तिरूपति में हुआ। इसके बाद उन्होने वेल्लूर और मद्रास कालेजों में शिक्षा प्राप्त की। राधाकृष्णन को संविधान निर्मात्रि सभा का सदस्य बनाया गया। वह 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रह इसी बीच वे ख्यातिप्राप्त विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये।
 शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ठ योगदान देने के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने महान दार्शनिक शिक्षाविद् और लेखक डा0 राधाकृष्णन को देश का सर्वौच्च अलंकरण ‘‘ भारतरत्न‘‘ प्रदान किया। इनके मरणोपरान्त इन्हे 1975 में इन्हे अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्पलन पुरस्कार‘ से सम्मानित किया गया था। जो धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे।
 उन्हे आज भी शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श शिक्षक के रूप में याद किया जाता है। आज भी उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में सम्पूर्ण भारत में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाकर डा0 राधाकृष्णन को सम्मान व्यक्त किया जाता है। इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षको को उनके योगदान के लिए पुरस्कार प्रदान किया जाता है।