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सद्गुरू स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी
November 12, 2019 • श्रद्धेय रामप्यारे त्रिवेदी द्वारा लिखित

अनन्तश्री विभूषित स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी की अवतरण कथा का अधिष्ठान श्रीमद्भगवतगीता का छठवां अध्याय है, जिसमें योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि संन्यासी और योगी की निष्काम कर्म चेष्टा और भगवत्प्राप्ति की ध्येयनिष्ठा एक ही प्रकार की है। दोनों में भेद नहीं देखना चाहिए। दस श्लोकों तक इसी की तात्विक मीमांसा है, ग्यारहवें श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण मानो किसी योग प्रशिक्षक की तरह अर्जुन को योगाभ्यास की विधि बता रहे हैं- शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊंचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थापित करें। उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके योग का अभ्यास करें। आगे के श्लोकों में तन और मन का तादात्म्य स्थापित करने की विधि-निषेध वाणी है। इसके लिए संतुलित भोजन, संतुलित शयन की अनिवार्यता बताकर भगवान श्रीकृष्ण 15वें श्लोक में श्रेष्ठयोगी की महान उपलब्धि का उद्घोष करते हैं- 'वश में किये हुए मन वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ, मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है। योग की महिमा का मेरूदण्ड वश में किया हुआ मन है, ऐसा सुनकर जिज्ञासु अर्जुन 34वें श्लोक में कहते हैं- हे श्रीकृष्ण यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए इसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भांति दुष्कर मानता हंू'' भगवान श्री कृष्ण को भी यह तर्क मानना पड़ा, मगर कहा कि अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है, किन्तु जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरूष द्वारा योग दुष्प्राप्य है। ऐसा निश्चयात्मक सन्देश सुनकर जिज्ञासु अर्जुन ने पुनः प्रश्न किया- यदि चंचल मन के कारण अन्तकाल में योगी भगवत्प्राप्ति का अभीष्ट लक्ष्य नहीं प्राप्त कर पाए तो वह किस गति को प्राप्त होता है? क्या यह आश्रय रहित पुरूष छिन्न-भिन्न बादल की भांति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? तब इस शंका के शमन के लिए जगद्गुरू श्रीकृष्ण के श्रीमुख से यह श्लोक प्रकट हुआ-
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्रच्यतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभि जायते।। 6-41
योगभ्रष्ट पुरूष स्वर्गादिक उत्तम लोकों को प्राप्त होकर, उसमें बहुत काल तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान् पुरूषों के घर में जन्म लेता है- अथवा योगियों के कुल में जन्म लेता है- वहां उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग को अनायास ही प्राप्त कर लेता है और हे कुरूच्नन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है। भगवान श्रीकृष्ण के इसी गूढ़ चिन्तन को आधार मान कर पूज्यवाद स्वामीनारदानन्द सरस्वती जी की अवतरण कथा लिखी जा रही है।   श्री गीता के दसवें अध्याय में बासुदेव श्री कृष्ण कहते हैं- ''मै महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ'' दैवयोग से संवत् 1954 में इसी माह के शुक्ल पक्ष में सप्तमी के दिन कन्नौज के मियांॅंगंज ग्राम के भू-सम्पदा सम्पन्न शिवभक्त पण्डित बुलाकी राम पाण्डेय के परिवार में हमारे गुरूदेव का जन्म हुआ था। पूज्य पितामह पण्डित बुलाकीराम जी को पौत्र रत्न प्राप्ति की सूचना, लोक संस्कृति की उद्घोषिका ढोलक की आवाज से मिली, पूरे गाँव में खुशियाँ छा र्गईं। समयानुसार नेग-न्योछावर के साथ नामकरण संस्कार हुआ और वह बाबूराम कहकर पुकारे जाने लगे, इनके पिता का नाम पण्डित बुद्धिलाल था। शनैः शनैः चन्द्रमा की कलाओं की तरह बालक का विकास होने लगा। पण्डित बुलाकी राम जी ने अपने घर के सामने शिवाला बनवा रखा था, नित्य प्रातः काल जब वे आरती-पूजन के लिए मन्दिर जाने लगते तो बाबूराम उनके कन्धांे पर सवारी करके मन्दिर में प्रवेश करते थे। हाथ उठाकर घण्टा बजाते रहना और मुंह से ''बाबा बम बम'' बोलते रहना बाबूराम का नित्य-नियम था। चार वर्ष की आयु तक यह बाल-लीला चली, इसके बाद एक त्रासदी ने इनके पारिवारिक हर्ष को हर लिया, पिताश्री बु़िद्धलाल का निधन हो गया, पण्डित बुलाकीराम पुत्र शोक में टूट गए। सम्बन्धों के संसार में 'सान्त्वना' से बड़ा कोई शब्द नहीं है, वह चारों ओर से यही कहकर मिली-''अब आपका सहारा बाबूराम ही है अब इसी को देखो''। मगर वे यह भी न देख पाए, बाबूराम केवल आठ वर्ष के थे, तभी दादाश्री का शरीर छूट गया। केवल चार वर्ष की आयु थी जब पिता का शरीर छूटा था। अब संरक्षक के रूप में केवल मां थी, जिन पर इनकी शिक्षा का दायित्व था। ब्रम्हलीन डाॅं. शौनक ब्रह्मचारी जी ने लिखा है कि यहीं से भिन्न-भिन्न रूपों में भगवान बाबूराम की सहायता में खड़े हो जाते थे। उन्होंने एक उदाहरण दिया मियांगज की प्राइमरी पाठशाला के प्रधानाचार्य पण्डित बिन्देश्वरी प्रसाद मूल निवासी तिरवा (रियासत) कन्नौज का, जिन्होंने अपने विद्यार्थी शिष्य बाबूराम की किशोर-अवस्था को धर्मपरायणता, ईश्वर भक्ति और निष्काम कर्म की ओर प्रेरित किया था। जो अपनी साधना का सम्प्रेषण शिष्य के जीवन में कर दे, वही सच्चा गुरू है, ऐसा ही बाजपेयी जी ने किया था।
उपनिषद् का एक प्रबोध सूत्र है- उतिष्ठत् जागृत प्राप्य बरान्नि बोधः'' उठो जागो और निकट सुलभ ज्ञान से जीवन-कलश भरो, इस भाव भूमिका में बाबूराम जी को देखते हैं। किशोर बाबूराम की कीर्ति कथा के तीन स्मृति बिन्दु प्रस्तुत हैं- सबसे पहले अपने ग्राम मियांगज में ''क्षेत्रीय सेवा समिति'' बनाई, 52 सदस्यों वाली इस संस्था का उद्देश्य था-निर्धन परिवारों की सहायता करना, रोगियों की चिकित्सा सुविधा, ग्राम सुरक्षा और धार्मिक आयोजन करना। गांव के कार्यालय में रामायण की यह चैपाई लिखकर टांगी गई-'' जेहि विधि सुखी होंहि पुरलोगा-करहिं कृपानिधि सोइ संयोगा'। इसी अवधि में दुर्धर्ष योग से सन 1918 में देश भर में युद्ध ज्वर (प्लेग) फैला और इसी की चपेट में इनका गाँव मियाँगंज भी आ गया था। प्रकृति की इस विनाश लीला में जी-जान होम कर सेवा में लगे हुए युवकों के टोली नायक बाबूराम जी थे। अब से सौ वर्ष पूर्व इस ग्रामांचल में समितियाँ बनाकर सेवा कार्याें में स्वयं संलग्न हुए और साथियों को भी जोड़ा था। उस काल की ग्राम सेवा से ही मानो गुरूदेव का ग्रामोदय दर्शन निकला था।
किशोर से तरूण होते-होते माँ के आग्रह से पण्डित बाबूराम जी का विवाह संस्कार तो हो गया, मगर इनके गृहस्थ जीवन की कहानी, सिमट कर एक-दो वाक्यों की ही रह गई, वह भी सन् 1929 में धर्मपत्नी के दिवंगत हो जाते ही समाप्त हो गई। एक-एक कर सब चले गए, पहले पिता, फिर पितामह, इनके बाद माता गेंदा देवी और अन्त में धर्मपत्नी का निधन हो गया। शायद इनकी कुण्डली में कुल-वृद्धि के अंक नहीं, कुल विग्रह के ग्रह ज्यादा प्रबल थे। एक जन्म के दो जीवन कैसे होते हैं श्री गुरूदेव इसके एक उदाहरण थे। यद्यपि आगे के शब्द इनके जीवनवृत्त की अगली कड़ी के रूप में हैं, किन्तु यह प्रसंग शोधवृत्ति के श्रद्धावान स्त्री-पुरूषों के लिए एक अलौकिक वृत्तान्त भी है, जिसे आश्चर्यवत् पढ़ा जाए, यह लेखक की मंशा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व कन्नौज क्षेत्र के मियागंज नामक गांव में एक निश्चित स्थान में निश्चित समय पर 12 वर्षों तक नित्य सत्संग की व्यवस्था चली थी, जिसके संचालक श्री बाबूरामजी थे, ऐसा पढ़ने को मिलता है। कमरे की एक दीवाल पर यह चैपाई लिखकर  उसे देवालय बना दिया गया था-
मति कीरति गति भूति भलाई-जो जेहि जतन जहां जेहि पाई।
सो जानब सत्संग प्रभाऊ-लोकहु वेद न आन उपाऊ।।
श्रीरामचरितमानस की इस चैपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी ने सत्संग के चतुर्दिक प्रभाव का पंचामृत बांटा है, वही कार्य कभी इस ग्राम में हुआ था। थोड़े समय बाद इस सत्संग के माध्यम से जागृत हो चुकी साधक टोली को भगवान की अहेतुकी कृपा, परमहंस स्वामी एकरसानन्द सरस्वती जी के स्वरूप में प्राप्त हुई, मानो घर बैठे भगवान मिल गए हों। इस विलक्षण विभूति का जन्म तब के मध्य भारत प्रान्त के सिन्धी नामक ग्राम में पालीवाल परिवार में हुआ था, पूर्व आश्रम में इनका नाम नारायण दास था। विरक्ति भाव से विचरते-विचरते ब्रह्मावर्त (बिठूर) पहुंच गए और वहां के एक मन्दिर में आप पुजारी जी के नाम से पुकारे जाने लगे। अनुमान है कि यह सम्बोधन (पुजारी जी) तीस दिन भी नहीं चला, इसी बीच सराय प्रयाग जनपद कन्नौज के ऐसे श्रद्धालुओं की दृष्टि इन पर पड़ी, जिनको इनके अन्दर परमात्मा का विशेष प्रकाश दिखाई पड़ा। उनके नाम अवश्य ही प्रकाश में आए होंगे, जिनकी श्रद्धा ने स्वामी एकरसानन्द जी को अपने ग्राम मंे लाकर उन्हें ग्राम देवता की तरह स्थापित किया था। कन्नौज को सुगन्ध की नगरी भी कहते हैं, शायद भगवान को भी यह सम्बोधन अच्छा लगा होगा, तभी वह क्षेत्र संतत्व की सुगन्ध का एक अलौकिक केन्द्र बना था। चारों ओर सरायप्रयाग में पधारे हुए स्वामी एकरसानन्द जी की चर्चा फैल गई। इस चर्चा में इन महात्मा जी के दस महान उपदेशों का छपा हुआ पर्चा भी भक्तों में बंटने लगा था। इस प्रचार की पहल मियागंज के सत्संग मण्डल ने की थी, जिसके प्रमुख तीन सदस्य थे, श्री बाबूराम पाण्डे, श्री लड़ैतेलाल और श्री प्रयागनारायण जी। स्वामी एकरसानन्द जी बहुत समय तक इन तीनों साधकों की सेवा-भावना को परखते रहे, फिर प्रसन्न होकर इनके मन-मस्तिष्क में भक्ति ज्ञान और वैराग्य के बीज डाले और जब वे अंकुरित होते दिखे तो एक दिन दीक्षा समारोह करके इस त्रिमूर्ति के नाम और स्वरूप बदल दिए। बाबूराम का नाम लेकर कहा- 'अब इन्हें नारदानन्द कहा जाएगा'' इसी तरह लड़ैतेलालको भजनानन्द का नया सम्बोधन मिला और श्री प्रयागनारायण के सिर पर हाथ रखकर कहा- ''ये शुकदेवानन्द हैं। श्रद्धालुओं में इनके स्वामीपद की प्रतिष्ठा इसी दिन से आगे बढ़ी थी। लिखा मिलता है कि इनके अतिरिक्त चैथा नाम प्रकाशानन्द का भी था। जिन विद्वान पाठकों के संज्ञान मंे स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन के पावन प्रसंग हैं, उनमें एक यह भी है कि एक दिन (1884) में स्वामी जी ने ऐसे ही 'नरेन' (विवेकानन्द) के अतिरिक्त ग्यारह युवा शिष्यों को दीक्षा देकर उनके ऐसे ही ''आनन्द'' लगाकर नाम बदले थे। इसे आत्मा का सम्प्रेषण कहिए या दैवी संयोग कि उत्तर भारत में वैसा ही चमत्कार दिखाकर स्वामी एकरसानन्द जी ब्रह्मलीन हुए थे। कहते हैं कि पिता अपने पुत्र को और गुरू अपने शिष्य को अपने से ऊँचा देखना चाहता है। वही यहां देखा गया। उसी अवसर पर सद्गुरू स्वामी एकरसानन्द जी अपने पट् शिष्य स्वामी नारदानन्द के पूर्ण समर्पित जीवन को लोक संग्रह के लिए परिब्राजक बनने से पूर्व अपने ही क्षेत्र के गंगातट पर रहकर तितीक्षा के साथ स्वाध्याय रूपी तप करने की आज्ञा दी थी, जिसे उन्होंने शिरोधार्य किया था। ब्रह्मलीन डाॅ. शौनक ब्रह्मचारी जी ने लिखा है कि संन्यास ग्रहण करने से पहले ही गुरूदेव भगवान ने अपनी सौ बीघे की पैत्रिक भूमि मानीमऊ ग्राम में रहने वाली छोटी बहन को दान कर दिया था। व्यवस्था-मुक्त होने के बाद जीवन-मुक्त होने की साधना गुरूदेव ने गंगागंज के समीप श्री गंगातट पर स्थित उस टीले पर पर्णकुटी बनाकर की थी, जिस पर प्रसिद्ध हो चुके महात्मा ''हाथी बाबा'' की समाधि बनी है। यहीं बैकुण्ठ आश्रम का निर्माण हुआ था और यही वह पवित्र स्थल है, जहां से दैवी सम्पद् मण्डल की स्थापना का संदेश प्रकाशित हुआ था। सारी दुनिया के विद्वानों के लिए आज भी यह संवाद 'आश्चर्यवत्' पढ़ा जाने वाला है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज क्षेत्र मंे मियागंज नामक एक गांव से स्वामी एकरसानन्द जी ने स्वामी नारदानन्द जी, स्वामी भजनानन्द जी तथा स्वामी शुकदेवनन्द जी तीन ऐसे महात्मा निकाले जिनका प्रभाव क्षेत्र सम्पूर्ण भारत रहा है। समदर्शी श्रद्धा को इन तीनों महान विभूतियों की अवतरण कथा एक जैसी लगती है।
यद्यपि सद्गुरू की कृपादृष्टि ही साधक शिष्य के अन्तःकरण को प्रकाशित करती है, किन्तु उसकी कर्मज्योति का प्रकाश किस पुण्यक्षेत्र को प्राप्त होगा, उसके क्या-क्या निमित्त कारण होंगे, इसका निर्णय परमसत्ता के परमाणु करते हैं। सामान्यजन इसी को विधाता का विधान कहते हैं कि श्री गंगातट पर की गई सद्गुरू स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी की तपस्या नैमिषारण्य में आदिगंगा गोमती के पावन तट पर खिली थी। अनन्तश्री विभूषित स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी की अवतरण कथा का अधिष्ठान श्रीमद्भगवतगीता का छठवां अध्याय है, जिसमें योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि संन्यासी और योगी की निष्काम कर्म चेष्टा और भगवत्प्राप्ति की ध्येयनिष्ठा एक ही प्रकार की है। दोनों में भेद नहीं देखना चाहिए। दस श्लोकों तक इसी की तात्विक मीमांसा है, ग्यारहवें श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण मानो किसी योग प्रशिक्षक की तरह अर्जुन को योगाभ्यास की विधि बता रहे हैं- शुद्ध भूमि में जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊंचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थापित करें। उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके योग का अभ्यास करें। आगे के श्लोकों में तन और मन का तादात्म्य स्थापित करने की विधि-निषेध वाणी है। इसके लिए संतुलित भोजन, संतुलित शयन की अनिवार्यता बताकर भगवान श्रीकृष्ण 15वें श्लोक में श्रेष्ठयोगी की महान उपलब्धि का उद्घोष करते हैं- 'वश में किये हुए मन वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ, मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है। योग की महिमा का मेरूदण्ड वश में किया हुआ मन है, ऐसा सुनकर जिज्ञासु अर्जुन 34वें श्लोक में कहते हैं- हे श्रीकृष्ण यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए इसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भांति दुष्कर मानता हंू'' भगवान श्री कृष्ण को भी यह तर्क मानना पड़ा, मगर कहा कि अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है, किन्तु जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरूष द्वारा योग दुष्प्राप्य है। ऐसा निश्चयात्मक सन्देश सुनकर जिज्ञासु अर्जुन ने पुनः प्रश्न किया- यदि चंचल मन के कारण अन्तकाल में योगी भगवत्प्राप्ति का अभीष्ट लक्ष्य नहीं प्राप्त कर पाए तो वह किस गति को प्राप्त होता है? क्या यह आश्रय रहित पुरूष छिन्न-भिन्न बादल की भांति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता? तब इस शंका के शमन के लिए जगद्गुरू श्रीकृष्ण के श्रीमुख से यह श्लोक प्रकट हुआ-
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्रच्यतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभि जायते।। 6-41
योगभ्रष्ट पुरूष स्वर्गादिक उत्तम लोकों को प्राप्त होकर, उसमें बहुत काल तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान् पुरूषों के घर में जन्म लेता है- अथवा योगियों के कुल में जन्म लेता है- वहां उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि संयोग को अनायास ही प्राप्त कर लेता है और हे कुरूच्नन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है। भगवान श्रीकृष्ण के इसी गूढ़ चिन्तन को आधार मान कर पूज्यवाद स्वामीनारदानन्द सरस्वती जी की अवतरण कथा लिखी जा रही है।   श्री गीता के दसवें अध्याय में बासुदेव श्री कृष्ण कहते हैं- ''मै महीनों में मार्गशीर्ष (अगहन) हूँ'' दैवयोग से संवत् 1954 में इसी माह के शुक्ल पक्ष में सप्तमी के दिन कन्नौज के मियांॅंगंज ग्राम के भू-सम्पदा सम्पन्न शिवभक्त पण्डित बुलाकी राम पाण्डेय के परिवार में हमारे गुरूदेव का जन्म हुआ था। पूज्य पितामह पण्डित बुलाकीराम जी को पौत्र रत्न प्राप्ति की सूचना, लोक संस्कृति की उद्घोषिका ढोलक की आवाज से मिली, पूरे गाँव में खुशियाँ छा र्गईं। समयानुसार नेग-न्योछावर के साथ नामकरण संस्कार हुआ और वह बाबूराम कहकर पुकारे जाने लगे, इनके पिता का नाम पण्डित बुद्धिलाल था। शनैः शनैः चन्द्रमा की कलाओं की तरह बालक का विकास होने लगा। पण्डित बुलाकी राम जी ने अपने घर के सामने शिवाला बनवा रखा था, नित्य प्रातः काल जब वे आरती-पूजन के लिए मन्दिर जाने लगते तो बाबूराम उनके कन्धांे पर सवारी करके मन्दिर में प्रवेश करते थे। हाथ उठाकर घण्टा बजाते रहना और मुंह से ''बाबा बम बम'' बोलते रहना बाबूराम का नित्य-नियम था। चार वर्ष की आयु तक यह बाल-लीला चली, इसके बाद एक त्रासदी ने इनके पारिवारिक हर्ष को हर लिया, पिताश्री बु़िद्धलाल का निधन हो गया, पण्डित बुलाकीराम पुत्र शोक में टूट गए। सम्बन्धों के संसार में 'सान्त्वना' से बड़ा कोई शब्द नहीं है, वह चारों ओर से यही कहकर मिली-''अब आपका सहारा बाबूराम ही है अब इसी को देखो''। मगर वे यह भी न देख पाए, बाबूराम केवल आठ वर्ष के थे, तभी दादाश्री का शरीर छूट गया। केवल चार वर्ष की आयु थी जब पिता का शरीर छूटा था। अब संरक्षक के रूप में केवल मां थी, जिन पर इनकी शिक्षा का दायित्व था। ब्रम्हलीन डाॅं. शौनक ब्रह्मचारी जी ने लिखा है कि यहीं से भिन्न-भिन्न रूपों में भगवान बाबूराम की सहायता में खड़े हो जाते थे। उन्होंने एक उदाहरण दिया मियांगज की प्राइमरी पाठशाला के प्रधानाचार्य पण्डित बिन्देश्वरी प्रसाद मूल निवासी तिरवा (रियासत) कन्नौज का, जिन्होंने अपने विद्यार्थी शिष्य बाबूराम की किशोर-अवस्था को धर्मपरायणता, ईश्वर भक्ति और निष्काम कर्म की ओर प्रेरित किया था। जो अपनी साधना का सम्प्रेषण शिष्य के जीवन में कर दे, वही सच्चा गुरू है, ऐसा ही बाजपेयी जी ने किया था।
उपनिषद् का एक प्रबोध सूत्र है- उतिष्ठत् जागृत प्राप्य बरान्नि बोधः'' उठो जागो और निकट सुलभ ज्ञान से जीवन-कलश भरो, इस भाव भूमिका में बाबूराम जी को देखते हैं। किशोर बाबूराम की कीर्ति कथा के तीन स्मृति बिन्दु प्रस्तुत हैं- सबसे पहले अपने ग्राम मियांगज में ''क्षेत्रीय सेवा समिति'' बनाई, 52 सदस्यों वाली इस संस्था का उद्देश्य था-निर्धन परिवारों की सहायता करना, रोगियों की चिकित्सा सुविधा, ग्राम सुरक्षा और धार्मिक आयोजन करना। गांव के कार्यालय में रामायण की यह चैपाई लिखकर टांगी गई-'' जेहि विधि सुखी होंहि पुरलोगा-करहिं कृपानिधि सोइ संयोगा'। इसी अवधि में दुर्धर्ष योग से सन 1918 में देश भर में युद्ध ज्वर (प्लेग) फैला और इसी की चपेट में इनका गाँव मियाँगंज भी आ गया था। प्रकृति की इस विनाश लीला में जी-जान होम कर सेवा में लगे हुए युवकों के टोली नायक बाबूराम जी थे। अब से सौ वर्ष पूर्व इस ग्रामांचल में समितियाँ बनाकर सेवा कार्याें में स्वयं संलग्न हुए और साथियों को भी जोड़ा था। उस काल की ग्राम सेवा से ही मानो गुरूदेव का ग्रामोदय दर्शन निकला था।
किशोर से तरूण होते-होते माँ के आग्रह से पण्डित बाबूराम जी का विवाह संस्कार तो हो गया, मगर इनके गृहस्थ जीवन की कहानी, सिमट कर एक-दो वाक्यों की ही रह गई, वह भी सन् 1929 में धर्मपत्नी के दिवंगत हो जाते ही समाप्त हो गई। एक-एक कर सब चले गए, पहले पिता, फिर पितामह, इनके बाद माता गेंदा देवी और अन्त में धर्मपत्नी का निधन हो गया। शायद इनकी कुण्डली में कुल-वृद्धि के अंक नहीं, कुल विग्रह के ग्रह ज्यादा प्रबल थे। एक जन्म के दो जीवन कैसे होते हैं श्री गुरूदेव इसके एक उदाहरण थे। यद्यपि आगे के शब्द इनके जीवनवृत्त की अगली कड़ी के रूप में हैं, किन्तु यह प्रसंग शोधवृत्ति के श्रद्धावान स्त्री-पुरूषों के लिए एक अलौकिक वृत्तान्त भी है, जिसे आश्चर्यवत् पढ़ा जाए, यह लेखक की मंशा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व कन्नौज क्षेत्र के मियागंज नामक गांव में एक निश्चित स्थान में निश्चित समय पर 12 वर्षों तक नित्य सत्संग की व्यवस्था चली थी, जिसके संचालक श्री बाबूरामजी थे, ऐसा पढ़ने को मिलता है। कमरे की एक दीवाल पर यह चैपाई लिखकर  उसे देवालय बना दिया गया था-
मति कीरति गति भूति भलाई-जो जेहि जतन जहां जेहि पाई।
सो जानब सत्संग प्रभाऊ-लोकहु वेद न आन उपाऊ।।
श्रीरामचरितमानस की इस चैपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी ने सत्संग के चतुर्दिक प्रभाव का पंचामृत बांटा है, वही कार्य कभी इस ग्राम में हुआ था। थोड़े समय बाद इस सत्संग के माध्यम से जागृत हो चुकी साधक टोली को भगवान की अहेतुकी कृपा, परमहंस स्वामी एकरसानन्द सरस्वती जी के स्वरूप में प्राप्त हुई, मानो घर बैठे भगवान मिल गए हों। इस विलक्षण विभूति का जन्म तब के मध्य भारत प्रान्त के सिन्धी नामक ग्राम में पालीवाल परिवार में हुआ था, पूर्व आश्रम में इनका नाम नारायण दास था। विरक्ति भाव से विचरते-विचरते ब्रह्मावर्त (बिठूर) पहुंच गए और वहां के एक मन्दिर में आप पुजारी जी के नाम से पुकारे जाने लगे। अनुमान है कि यह सम्बोधन (पुजारी जी) तीस दिन भी नहीं चला, इसी बीच सराय प्रयाग जनपद कन्नौज के ऐसे श्रद्धालुओं की दृष्टि इन पर पड़ी, जिनको इनके अन्दर परमात्मा का विशेष प्रकाश दिखाई पड़ा। उनके नाम अवश्य ही प्रकाश में आए होंगे, जिनकी श्रद्धा ने स्वामी एकरसानन्द जी को अपने ग्राम मंे लाकर उन्हें ग्राम देवता की तरह स्थापित किया था। कन्नौज को सुगन्ध की नगरी भी कहते हैं, शायद भगवान को भी यह सम्बोधन अच्छा लगा होगा, तभी वह क्षेत्र संतत्व की सुगन्ध का एक अलौकिक केन्द्र बना था। चारों ओर सरायप्रयाग में पधारे हुए स्वामी एकरसानन्द जी की चर्चा फैल गई। इस चर्चा में इन महात्मा जी के दस महान उपदेशों का छपा हुआ पर्चा भी भक्तों में बंटने लगा था। इस प्रचार की पहल मियागंज के सत्संग मण्डल ने की थी, जिसके प्रमुख तीन सदस्य थे, श्री बाबूराम पाण्डे, श्री लड़ैतेलाल और श्री प्रयागनारायण जी। स्वामी एकरसानन्द जी बहुत समय तक इन तीनों साधकों की सेवा-भावना को परखते रहे, फिर प्रसन्न होकर इनके मन-मस्तिष्क में भक्ति ज्ञान और वैराग्य के बीज डाले और जब वे अंकुरित होते दिखे तो एक दिन दीक्षा समारोह करके इस त्रिमूर्ति के नाम और स्वरूप बदल दिए। बाबूराम का नाम लेकर कहा- 'अब इन्हें नारदानन्द कहा जाएगा'' इसी तरह लड़ैतेलालको भजनानन्द का नया सम्बोधन मिला और श्री प्रयागनारायण के सिर पर हाथ रखकर कहा- ''ये शुकदेवानन्द हैं। श्रद्धालुओं में इनके स्वामीपद की प्रतिष्ठा इसी दिन से आगे बढ़ी थी। लिखा मिलता है कि इनके अतिरिक्त चैथा नाम प्रकाशानन्द का भी था। जिन विद्वान पाठकों के संज्ञान मंे स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन के पावन प्रसंग हैं, उनमें एक यह भी है कि एक दिन (1884) में स्वामी जी ने ऐसे ही 'नरेन' (विवेकानन्द) के अतिरिक्त ग्यारह युवा शिष्यों को दीक्षा देकर उनके ऐसे ही ''आनन्द'' लगाकर नाम बदले थे। इसे आत्मा का सम्प्रेषण कहिए या दैवी संयोग कि उत्तर भारत में वैसा ही चमत्कार दिखाकर स्वामी एकरसानन्द जी ब्रह्मलीन हुए थे। कहते हैं कि पिता अपने पुत्र को और गुरू अपने शिष्य को अपने से ऊँचा देखना चाहता है। वही यहां देखा गया। उसी अवसर पर सद्गुरू स्वामी एकरसानन्द जी अपने पट् शिष्य स्वामी नारदानन्द के पूर्ण समर्पित जीवन को लोक संग्रह के लिए परिब्राजक बनने से पूर्व अपने ही क्षेत्र के गंगातट पर रहकर तितीक्षा के साथ स्वाध्याय रूपी तप करने की आज्ञा दी थी, जिसे उन्होंने शिरोधार्य किया था। ब्रह्मलीन डाॅ. शौनक ब्रह्मचारी जी ने लिखा है कि संन्यास ग्रहण करने से पहले ही गुरूदेव भगवान ने अपनी सौ बीघे की पैत्रिक भूमि मानीमऊ ग्राम में रहने वाली छोटी बहन को दान कर दिया था। व्यवस्था-मुक्त होने के बाद जीवन-मुक्त होने की साधना गुरूदेव ने गंगागंज के समीप श्री गंगातट पर स्थित उस टीले पर पर्णकुटी बनाकर की थी, जिस पर प्रसिद्ध हो चुके महात्मा ''हाथी बाबा'' की समाधि बनी है। यहीं बैकुण्ठ आश्रम का निर्माण हुआ था और यही वह पवित्र स्थल है, जहां से दैवी सम्पद् मण्डल की स्थापना का संदेश प्रकाशित हुआ था। सारी दुनिया के विद्वानों के लिए आज भी यह संवाद 'आश्चर्यवत्' पढ़ा जाने वाला है कि उत्तर प्रदेश के कन्नौज क्षेत्र मंे मियागंज नामक एक गांव से स्वामी एकरसानन्द जी ने स्वामी नारदानन्द जी, स्वामी भजनानन्द जी तथा स्वामी शुकदेवनन्द जी तीन ऐसे महात्मा निकाले जिनका प्रभाव क्षेत्र सम्पूर्ण भारत रहा है। समदर्शी श्रद्धा को इन तीनों महान विभूतियों की अवतरण कथा एक जैसी लगती है।
यद्यपि सद्गुरू की कृपादृष्टि ही साधक शिष्य के अन्तःकरण को प्रकाशित करती है, किन्तु उसकी कर्मज्योति का प्रकाश किस पुण्यक्षेत्र को प्राप्त होगा, उसके क्या-क्या निमित्त कारण होंगे, इसका निर्णय परमसत्ता के परमाणु करते हैं। सामान्यजन इसी को विधाता का विधान कहते हैं कि श्री गंगातट पर की गई सद्गुरू स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी की तपस्या नैमिषारण्य में आदिगंगा गोमती के पावन तट पर खिली थी।