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सहिष्णुता हमें आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है
November 14, 2019 • डा0 जगदीश गांधी, शिक्षाविद्

(1)  संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहिष्णुता की भावना को बढ़ावा देने का निर्णय:-संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेम्बली ने वर्ष 1996 में एक प्रस्ताव स्वीकृत करके सदस्य देशों को प्रतिवर्ष 16 नवम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस मनाने के लिए आमंत्रित किया। इस दिवस पर विश्व भर में मानव कल्याण, स्वतंत्रता, तथा हर क्षेत्र में विकास पर चर्चा होती है। साथ ही विश्व की विभिन्न संस्कृतियों तथा सभ्य समाज के लोगों के बीच सहिष्णुता को प्रोत्साहन, सम्मान तथा सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने अपने संदेश में कहा है कि वर्तमान में हम विश्वव्यापी आदान-प्रदान के युग में रह रहे हैं। वैश्विक सूचना तकनीकी तथा आर्थिक विकास हमें एक-दूसरे के नजदीक ला रहा है। विभिन्न संस्कृतियों के बीच गहराई से आदान-प्रदान हो रहा है। किन्तु इस सबका अर्थ यह नहीं है कि विश्ववासियों के बीच समझदारी बढ़ रही है। समाज में और अधिक विविधता बढ़ रही है लेकिन सहिष्णुता की भावना का कई क्षेत्रों में विकास हो रहा है।
(2)  यूनेस्को के डायरेक्टर-जनरल ने अपने संदेश में कहा है कि विश्वव्यापी समाज में यह दिवस हमें आपस में सहयोगपूर्वक तथा मिलजुल कर रहने की प्रेरणा देता है। वैश्विक युग में हमें सहिष्णुता, विश्वास तथा समझदारी के नये ब्रिज बनाने की आवश्यकता है। वही दूसरी ओर धरती पर पलने वाले मानव जीवन सहित समस्त जीवों के ऊपर अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, तृतीय विश्व युद्ध की आशंका, परमाणु शस्त्र बनाने की होड़, ग्लोबल वार्मिंग, ओजन परत का क्षरण, प्रौद्योगिकी का दुरूपयोग, वृहत सुनामी, आकाल, भूकंप, मरुस्थलीकरण, प्रकृति का अनियंत्रित तथा अत्यधिक उपभोग, सूखा, बाढ़, जल संकट, वनों की कटाई आदि का सदैव संकट मंडराता रहता है। ऐसे विषम समय में मानव जाति को विश्वव्यापी समस्याओं का एक सर्वमान्य समाधान खोजना चाहिए। 
(3)  21वीं सदी का सबसे बड़ा मानवीय आपातकाल:- एक रिपोर्ट के अनुसार सीरिया में जारी गृहयुद्ध की वजह से तीस लाख से अधिक लोग देश से पलायन कर चुके हैं। इस संकट को नई सदी का सबसे बड़ा मानवीय आपातकाल बताया जा रहा है। ऐसे वक्त में, जब आतंकवाद का चेहरा दिनोंदिन बर्बर होता जा रहा है, सीरिया में जारी गृहयुद्ध की वजह से पलायन करने वाले लोगों का आंकड़ा भी नई ऊँचाइयों को छू रहा है। हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजंेसी की रिपोर्ट बताती है कि सीरिया संकट की वजह से 30 लाख से अधिक लोगों ने पलायन किया है। पलायन रूपी इस संकट को एजेंसी ने 'हमारे युग का सबसे बड़ा मानवीय आपातकाल' बताया है। 
(4)  युद्ध में फंसी हुई दुनिया शांति के अमृत की प्यासी है:- अनुभव से साबित होता है कि कोई भी अन्यायपूर्ण और कपटपूर्ण व्यवस्था स्थायी नहीं हो पाती। बड़े-बड़े साम्राज्य अपने अंतर विरोधों के कारण ढह चुके हैं। जिस ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था, उसे यूरोप के एक छोटे से टापू में सिमटते हुए हमने देखा है। अंग्रेजों की तरह की गलती आज शक्तिशाली देश भी अपनी परमाणु बमों की ताकत के बल पर दोहरा रहे हंै। वे अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए दूसरे देशों पर आक्रमण करने का बहाना ढूंढते हंै। यदि इन शक्तिशाली देशों ने अंग्रेजी साम्राज्य के पतन से सबक नहीं सीखा तो ब्रिटिश साम्राज्य की तरह की दयनीय स्थिति भी सारा विश्व देखेगा। अणुबम ने उन श्रेष्ठतम भावनाओं को मार दिया है, जिन्होंने मानव-जाति को युगों से जीवित रखा है। अगर हथियारों के लिए आज की पागलभरी दौड़, स्पर्धा जारी रही, तो निश्चित रूप से उसका परिणाम ऐसे मानव-संहार में आयेगा, जैसा संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। अगर कोई विजेता बचा रहा तो जिस राष्ट्र की विजय होगी, उसके लिए वह विजय ही जीवित मृत्यु-जैसी बन जायगी।
(5)  अभी कदम नहीं उठाया तो फिर कभी ऐसा अवसर नहीं आयेगा:- सभी धर्मो का स्त्रोत एक परमात्मा है। धर्म एक बार स्थापित होता है बार-बार नहीं। धर्म सदैव से एक है। ईश्वर एक है। मानव जाति एक है। परमात्मा ने जिस प्रकार एक सूरज, एक चाँद, एक आसमान, एक सृष्टि को बनाया है उसी प्रकार पूरी एक पृथ्वी बनायी है। परमात्मा ने इस पृथ्वी को छोटे-छोटे टुकड़ों में नहीं बांटा है। देशों की सीमा रेखाएँ मानव निर्मित हैं। चलो हम मान भी ले कि रोटी, कपड़ा, मकान की व्यवस्था सुचारू रूप से करने के लिए हमने राष्ट्रों का निर्माण किया है तो फिर अपनी सुरक्षा की आशंका से या एक-दूसरे को डराने अथवा स्वयं डर कर सारी मानव जाति का सर्वविनाश करने के लिए 36,000 परमाणु बम बनाने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी? हमें सच्चे मन से यह स्वीकारना होगा कि कहीं हमसे बड़ी भूल हुई है। समय रहते भूल को सुधार लेना ही अक्लमंदी है। कहा भी गया है कि सुबह का भूला यदि शाम को वापिस घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते। एक-दूसरे पर दोष लगाने से समस्या का हल नहीं होने वाला। समस्या का सर्वमान्य समाधान ढूंढ़ने से समस्या हल होगी। अब एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के गठन का समय आ गया है।
(6)  परम पिता परमात्मा इस सृष्टि का रचनाकार है वह अपनी प्रत्येक रचना से प्रेम करता है:- मान लीजिए एक माता-पिता की चार संतानें हो। वे एक घर में प्रेम से रहने की बजाय एक-दूसरे से लड़े-झगड़े तो माता-पिता को इससे खुशी होगी या तकलीफ होगी? इसी प्रकार धरती माँ तथा परमात्मा की सात अरब संतानें आपस में मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने की बजाय एक-दूसरे का खून बहाये तो इससे परमात्मा को खुशी होती होगी या तकलीफ होती होगी? इस पर थोड़ा-सा ठहरकर विचार करने की आवश्यकता है। संसार में पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में इस ज्ञान को फैलाने की आवश्यकता है कि 'धरती हमारी माँ है और परमात्मा हमारा पिता है।' हम सभी एक ही माता-पिता की संतानेें हैं। धरती माता ने अपने गर्भ में रखकर हमें शारीरिक पोषण दिया है तथा परमात्मा ने अपनी आत्मा का अंश हमें दिया है।
(7)  भारत लघु विश्व का एक सुन्दर माॅडल है:- आज का भारत सभी प्रकार के मतों, सिद्धातों और मान्यताओं को समान महत्व देने वाला लघु विश्व कहा जा सकता है। वैसे भी आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक सहिष्णु है। कारण चाहे कुछ भी रहे हों, कितने ही सुंदर तर्क दिए गए हों, तथाकथित धर्मरक्षक जब सहिष्णुता का त्याग कर देते हैं तब राष्ट्र तथा विश्व के विघटन का खतरा उत्पन्न हो जाता है। विश्व के विभिन्न हिस्सों में भी आए दिन कुछ न कुछ धार्मिक विवाद भड़क उठते हैं, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द को क्षति पहुँचती है। चूँकि विघटनकारी तत्व हर समुदाय में हैं अतः ये लोग तिल का ताड़ बनाकर अपने स्वार्थ को पूरा करने में सफल होना चाहते हैं। धार्मिक सहिष्णुता सभी धर्मों का वास्तविक तथ्य रहा है क्योंकि हर धर्म न्याय, प्रेम, अहिंसा, सत्य आदि की बुनियाद पर खड़ा है। इसीलिए विद्वानों को यह स्वीकार करना पड़ता है कि कोई भी धर्म बुरा नहीं है बल्कि धार्मिकता बुरी है। धर्म को मानने वाले अपने धर्म की गलत व्याख्या कर यदि उसका दुरूपयोग करें तो उसमें धर्म का क्या दोष? निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यदि व्यक्ति अपने धर्म से प्रेरणा लेकर थोड़ी सी सहज क्षमता प्रदर्शित करें तो सभी धार्मिक विवाद हल किए जा सकते हैं। इसलिए हमें विश्व के सभी लोगों में सर्वधर्म समभाव की शिक्षा का प्रकाश फैलाने की आवश्यकता है।   
(8)  धर्म का सच्चा ज्ञान संकुचित दीवारों को तोड़ देता है:- महात्मा गाँधी ने कहा है कि आचरण का सुनहरा नियम यह है कि आपस में यह समझकर सहिष्णुता रखी जाय कि हम सबके विचार एक-से कभी नहीं होंगे और हम सत्य को आंशिक रूप में और विभिन्न दृष्टियों से देख सकते हैं। अगर हम असहिष्णुता से दूसरों के मत का दमन करेंगे, तो हमारा पक्ष पिछड़ जायगा। असहिष्णुता बताती है कि अपने ध्येय की सच्चाई में हमारा पूरा विश्वास नहीं है। सहिष्णुता हमें आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, जो 
धर्मांधता से उतनी ही दूर है, जितना उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव। धर्म का सच्चा ज्ञान धर्म और दूसरे धर्म के बीच की दीवारों को तोड़ देता है। प्रत्येक मानव अपने दृष्टिकोण से सच्चा है, परंतु यह संभव नहीं कि प्रत्येक मानव गलत हो। इसीलिए सहिष्णुता की जरूरत पैदा होती है। इस सहिष्णुता-गुण का यह अर्थ नहीं कि हम अपने धर्म की उपेक्षा करें, वरन यह है कि अपने धर्म के प्रति हम अधिक ज्ञानमय, अधिक सात्त्विक और निर्मल प्रेम रखें। दुनिया में कई चीजें ऐसी होती रहती हैं, जो अपने मन की नहीं होती, फिर भी हम उन्हें सहन करते हैं। सहिष्णुता के लिए जरूरी नहीं है कि जिस चीज को मैं सहन करूं, उसका मैं समर्थन भी करूँ।
(9)  परमात्मा की राह में धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए:- धैर्य से या शांति से, क्या नहीं हो सकता? इसका तजुर्बा लेना चाहें तो रोज मिल सकता है। यदि धैर्य का कोई मूल्य है तो उसे अंत तक सहन करना चाहिए। एक प्राणवान विश्वास कठोरतम तूफान के बीच में भी बना रहेगा। विपत्ति के लिए धैर्य के सिवा और कोई इलाज नहीं है। हम धीरज खो दें तो हम हार जायेंगे। अधीरज को धीरज से ही मारा जा सकता है। जब हमारे दिल में शक पैदा हो जाता है तो अच्छा तरीका यही है कि हम धैर्य रखकर बैठे रहें, बजाय इसके कि हम कोई पत्थर फेंक कर मामले को और बिगाड़ें। आनंद दूसरों को कष्ट देने से प्राप्त नहीं होता, बल्कि स्वेच्छा से स्वयं कष्ट सहने मेें आता है। खुशी से सहन किया हुआ कष्ट कष्ट नहीं रहता, वह सदा रहने वाले आनंद में बदल जाता है। क्रोधहीन तथा द्वेषरहित कष्ट के उदीयमान सूर्य के सामने कठोरतम हृदय और बड़े-से-बड़ा अज्ञान नष्ट हो जाता है। कठिनाइयाँ सामना करने या सहन करने के लिए होती हैं, न कि हमें कायर बनाने के लिए। विपरीत परिस्थिति पर विजय प्राप्त करना मनुष्य का विशेषाधिकार है। प्रकृति ने आदमी के अंतःकरण में ऐसी किसी भी कठिनाई या कष्ट का सामना करने की योग्यता दी है जो कि उसके सामने अचानक आ जाये। लंबी यात्रा का पथिक रास्ते में झगड़ा मोल नहीं लेता। उस पर झगड़ा थोपा भी जाये, तो भी बच कर निकल जाता है, क्योंकि उसकी आंखों में मंजिल तक पहँुचने की जिद होती है। विश्व में भी वह आगे बढ़ने की जिद पैदा हो जाये, तो जाति, पंथ, भाषा, प्रांत, रंग के भेद सब स्वतः बिना प्रयास ही पीछे छूट जायेंगे।  
(10)  विश्व एकता की शिक्षा आज की परम आवश्यकता है:- देश प्रेम में अपने देश तथा अपने देशवासियों के हित के लिए जान की बाजी लगाने की भावना प्रत्येक नागरिक में होनी आवश्यक है। किन्तु विश्व दृष्टि तथा सहिष्णुता के अभाव में बमों के जख्मों से कराह रही धरती माँ तथा युद्ध की अग्नि में जल रहे धरतीवासियों के घाव तथा कराह भी हमें दिखायी तथा सुनायी देनी चाहिए। हमारा राष्ट्र प्रेम विश्व प्रेम के रूप में विकसित होना चाहिए। विश्व एकता की शिक्षा की आज सर्वाधिक आवश्यकता है।हमारा मानना है कि युद्ध के विचार मानव मस्तिष्क में पैदा होते हैं। इसलिए मानव मस्तिष्क में ही शान्ति के विचार डालने होंगे। मनुष्य को विचारवान बनाने की श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। इसलिए संसार के प्रत्येक बालक को विश्व एकता एवं विश्व शांति की शिक्षा बचपन से अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए।