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सम्पूर्ण पृथ्वी एक देश है
November 12, 2019 • प्रदीप कुमार सिंह

बहाउल्लाह (हिंदी अर्थ - ईश्वर का प्रकाश) का जन्म तेहरान (ईरान) में 12 नवम्बर 1817 में हुआ था। वे कभी स्कूल नहीं गए पर उनके पास ज्ञान का अथाह भंडार था। उन्होंने जो शिक्षा हासिल की वह घर से ही मिली। बहाउल्लाह जब 22 साल के थे तब उनके पिता का निधन हो गया था, उनके पिता एक मंत्री थे। इसके बाद वहां के राजा ने बहाउल्लाह को उनके पिता की जगह मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा पर उन्होंने इनकार कर दिया। बहाउल्लाह, बहाई धर्म के संस्थापक थे। इस बीच उन्होंने निराकार ईश्वर का सिद्धांत देकर सभी धर्मो को जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा नाम अलग-अलग हो सकते हैं पर ईश्वर तो एक ही है।
 बहाउल्लाह ने पूरी दुनिया को संदेश दिया कि हर एक युग में ईश्वर मानवजाति को शिक्षित करने हेतु मानव रूप में अवतरित होते हैं और वे इस युग के अवतार हैं और इस विश्व को एकता और शान्ति के सूत्र में बांधने आये हैं। दिल्ली का कमल मन्दिर (लोटस टेम्पल) बहाई धर्म के विश्व में स्थित सात मंदिरों में से एक है। पूरी दुनिया में बहाई धर्मावलंबी हैं, जो बहाउल्लाह को इस युग का ईश्वरीय अवतार मानते हैं। बहाउल्लाह ने 100 से ज्यादा पुस्तकें और हजारों प्रार्थनाएं लिखी थीं।
 बहाउल्लाह का सन्देश है - सम्पूर्ण पृथ्वी एक देश है और समस्त मानवजाति उसकी नागरिक है। बहाउल्लाह की समाधी इजराइल के हैफा शहर में हैं और कारमेल पर्वत पर बनाई गयी 'महात्मा बाब' और 'अब्दुल बहा' की समाधी बहाई धर्म का सबसे बड़ा तीर्थस्थल है।
 बहाउल्लाह मानवजाति की परिपक्वता के इस युग के एक महान ईश्वरीय संदेशवाहक है। बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण तत्कालिक शासक के आदेश से 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़े। जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें अनेक प्रकार की कठोर यातनायें दी र्गइं। जेल में ही बहाउल्लाह की आत्मा में प्रभु का प्रकाश आया। 'बहाउल्लाह' ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था उसके कारण धरती, पाताल तथा आकाश की कोई ताकत उन्हें प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकी। 
 बहाउल्लाह की सीख है कि परिवार में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहिन सभी परिवारजनों के हृदय मिलकर एक हो जाये तो परिवार में स्वर्ग उतर आयेगा। इसी प्रकार सारे संसार में सभी के हृदय एक हो जाँये तो सारा संसार स्वर्ग समान बन जायेगा। बहाई धर्म की प्रार्थना है कि एक कर दे हृदय अपने सेवकों के हे प्रभु, निज महान उद्देश्य उन पर कर प्रगट मेरे विभो। बहाउल्लाह ने कहा है कि ''विश्व एकता'' की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है और सब धर्मों का सार मानव मात्र की एकता स्थापित करना है। यह आज के युग की समस्याओं का एकमात्र समाधान है। परमात्मा ने बहाउल्लाह के माध्यम से हृदय की एकता का सन्देश पवित्र पुस्तक किताबे अकदस के द्वारा सारी मानव जाति को दिया।
 मानव जीवन मंे लगभग 200 वर्ष पूर्व भौतिकता का प्रभाव बढ़ जाने के कारण मानव से मानव की दूरियाँ बढ़ती जा रही थी और मानव जीवन दुखों से भरता जा रहा था तब दयालु परमपिता परमात्मा ने टुकडे़-टुकड़े में बंटे हुए मानव जीवन को 'हृदयों की एकता' के सूत्र में पिरोकर पारिवारिक एकता, विश्व एकता तथा मानव कल्याण के लिए इस युग के अवतार बहाउल्लाह को धरती पर भेजा। मानव समाज आज नवीन और महान युग में प्रवेश कर रहा है। 
 बहाउल्लाह का उद्देश्य आज के समाज को विख्ंाडित करने वाले परस्पर विरोधी विचारों की विविधता पर जोर न देकर उन्हें एक मिलन-बिन्दु पर लाना है। बहाउल्लाह का उद्देश्य अतीत काल के अवतारों की महानता अथवा उनकी शिक्षाओं के महत्व को कम करना नहीं बल्कि उनमें निहित आधारभूत सच्चाईयों को वर्तमान युग की आवश्यकताओं, क्षमताओं, समस्याओं और जटिलताओं के अनुरूप दुहराना है। बहाई धर्म की आधारशिला मानव मात्र की एकता है। बहाई धर्म पूरे विश्व से मतभेद समाप्त कर एक शान्तिमय एवं खुशहाल विश्व समाज की परिकल्पना पर अवलम्बित है। बहाई धर्म विश्व का ऐसा धर्म है जो कि सारी दुनिया को प्रेम, एकता एवं आध्यात्मिकता के पवित्र सूत्र में बांधने के लिए कार्य कर रहा हैं।
 बहाई धर्म विश्व के समस्त धर्मो का समिश्रण है। बहाई धर्म एक ऐसा धर्म है जो किसी भी धर्म की अवहेलना नहीं करता बल्कि सभी धर्मों को एक समान समझता है व सभी धर्मों और उनके अवतारों व पैगम्बरों का आदर करना सिखाता है। बहाई धर्म परमात्मा और इसके अवतारों की एकता को स्वीकार करता हुआ व 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के सिद्धान्त का समर्थन व पोषण करता है। बहाई शिक्षाओं के अनुसार हमारे जीवन के मूलतः चार उद्देश्य हैं:-    
(1) परमात्मा को 'जानना' तथा उसकी 'पूजा' करना। परमात्मा को 'जानने' के मायने है युग-युग में विभिन्न अवतारों के माध्यम से दिये गये पवित्र ग्रन्थों में जाकर परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को जानना तथा पूजा के मायने है प्रभु की इच्छा के अनुसार 'प्रभु का कार्य' करना।  
(2) प्रभु कार्य के लिए प्रगतिशील धर्म के अन्तर्गत युग-युग में परमात्मा की ओर से अवतरित अवतारांे राम, कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, गुरू नानक, महावीर, मोजज, अब्राहीम, बहाउल्लाह आदि तथा उनके द्वारा दिये गये पवित्र ग्रन्थों में उद्घाटित ईश्वरीय शिक्षायें जैसे - मर्यादा, न्याय, सम्यक ज्ञान, करूणा, भाईचारा, त्याग, अहिंसा, हृदय की एकता आदि आध्यात्मिक मूल्यों को धारण करना। 
(3) मनुष्य योनि में हमारा जन्म अपनी आत्मा के विकास के लिए हुआ है। हमें अपनी आत्मा के विकास द्वारा अपनी अगली दुनियाँ (दिव्य लोक) की तैयारी करना चाहिए। इस हेतु हमें अपने प्रत्येक कार्य-व्यवसाय को 'प्रभु के कार्य' की पवित्र भावना से करना चाहिए। हमारा हमेशा यही प्रयत्न होना चाहिए कि हमारे प्रत्येक कार्य रोजाना परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने।   
(4)  परिवार, विद्यालय तथा समाज को मिलकर प्रत्येक बालक में बाल्यावस्था से ही भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक गुणों का संतुलित विकास करने का वातावरण निर्मित करना चाहिए। इस प्रकार मानव सभ्यता को आगे बढ़ाकर उसके अंतिम लक्ष्य अर्थात धरती पर आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहिये।
 सभी धर्मो के संस्थापकों या अन्तिम ईश्वरीय अवतारों द्वारा भविष्य में एक ऐसे ईश्वरीय अवतार के आगमन की भविष्यवाणियां की गई जो उनके धर्म को आगे ले जाकर विकास की चरम स्थिति तक पहुँचा दे और समस्त संसार को उस एक विश्व धर्म का अनुयायी बना दे। हिन्दु शास्त्रों के अनुसार विष्णु के दसवें कल्कि अवतार के आने की बात कही गयी है, वह संसार भर से पाप का नाश करके नये सतयुग का संस्थापक होगा, बौद्ध धर्मावलम्बी स्वयं भगवान बुद्ध द्वारा की गयी भविष्यवाणियों के अनुसार एक महान धर्मावतार 'मैत्रेय अमिताभा' की प्रतीक्षा कर रहे हैं, स्वयं ईसा मसीह ने अपने दिव्य पिता की पूर्ण आभा के साथ पुनः आने का वचन दिया है। पृथ्वी के समस्त जोरास्ट्रियन जो पारसी धर्म के अनुयायी हैं अपने ग्रंथों की भविष्यवाणियों के अनुसार एक महान ईश्वरीय अवतार 'शाह बहराम वरजावन्द' की प्रतीक्षा कर रहे हैं, इस्लाम धर्म की पुस्तकों के अनुसार समस्त मुसलमानों का भी यह विश्वास है कि कयामत के वक्त हजरत इमाम मिंहदी का जहूर होगा और उनके बाद मसीहा का पुनरागमन 'रूहूल्लाह' के रूप में होगा। सिख धर्म में भी उनके दसवें गुरू गोविन्दसिंह जी के वचनानुसार एक 'निष्कलंकी-अवतार' कल्कि नाम से प्रकट होगा। 
 बहाई जीवन दर्शन के कुछ प्रमुख सिद्धान्त है: ईश्वर एक है, सभी धर्म एक हैं तथा सम्पूर्ण मानवजाति एक है, सभी प्रकार के पूर्वाग्रह दूर हो, व्यक्ति स्वयं सत्य की खोज करे, एक सहायक विश्व भाषा हो, नारी तथा पुरूष समान हैं, शिक्षा सभी के लिए हो, विज्ञान तथा धर्म में सामंजस्य हो, अधिक धनाढ्ता तथा अधिक निर्धनता की समाप्ति हो, एक विश्व सरकार बने तथा संस्कृतियों की विविधता की रक्षा हो। बहाई पवित्र ग्रन्थ किताबे अकदस हमें प्रथम परामर्श यह देती है कि हे आत्मा के पुत्र, जब तू एक शुद्ध, दयालु एवं ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करेगा तब तुझे यह सारी सृष्टि अपने घर जैसी प्रतीत होगी। हमारा मानना है कि अब समय आ गया है कि हम सबके हृदय ईश्वरीय प्रेम में एक हो जायें क्योंकि सभी धर्मांे का óोत्र एक परमात्मा है। 
 बहाउल्लाह ने तीन प्रमुख शिक्षायें दी हैं - पहला कभी म्यान से तलवार नही निकलेगी। सभी अहिंसा का व्यवहार करेंगे और धरती से युद्ध समाप्त हो जायेगा। दूसरा वे एक हजार वर्ष के लिये अवतार के रूप में अपनी शिक्षाओं से प्रभावित करेंगे। इसके प्रभाव से सम्पूर्ण विश्व में  एकता तथा शान्ति आ जायेगी और मानव जाति निरन्तर प्रगति करेगी। तीसरा इस क्षण से धरती में जितनी भी ईश्वर की सृजित वस्तुयें हैं उनमें नई क्षमतायें उत्पन्न हो जायेगी जिसके फलस्वरूप एक नई चेतना जाग्रत हो जायेगी और उसी दिन से विज्ञान के क्षेत्र में अविष्कार होने आरम्भ हो गये। बहाउल्लाह ने कहा था कि वह दिन जल्द आयेगा जब सारे विश्व के लोग उनकी शिक्षाओं को स्वीकार करेंगे। 
 धरती पर आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना दो चरणों में होगी। बहाई संत अब्दुलबहा ने लगभग 100 वर्ष पूर्व कहा है कि स्वर्णिम सभ्यता का ध्वज सही मयाने में तब फहरायेगा जब दुनियाँ के हृदय स्थल में विलक्षण एवं श्रेष्ठ विचारों वाले राष्ट्राध्यक्ष सम्पूर्ण मानव जाति की खुशहाली के लिए एक साथ मिलकर दृढ़ निश्चय एवं दूरदृष्टि के साथ विश्व शान्ति स्थापित करने का बीड़ा उठायंेगे। पहले चरण में लघु शान्ति (लेजर पीस) की स्थापना विश्व के सभी देशों राष्ट्राध्यक्षांे तथा शासनाध्यक्षों के बीच एकता होने से होगी। दूसरे चरण में महान शान्ति (ग्रेटर पीस) तब आयेगी जब व्यापक रूप से हृदय परिवर्तन होगा। इस प्रकार धरती पर आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य पूरा होगा।