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शताब्दी वर्ष में फणीश्वरनाथ रेणु पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार
August 18, 2020 • ऋतंधरा मिश्रा, वरिष्ठ रंगकमी • Celebration

शताब्दी वर्ष में फणीश्वरनाथ रेणु: सृजन और संदर्भ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार के दूसरे दिन विशेष सत्र का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता डॉ पुनीत बिसारिया (अध्यक्ष हिंदी विभाग बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी) ने की।

विशिष्ट वक्ता के रूप में डॉ. सब्य साचिन (प्रिंसिपल, जी एस बी वी स्कूल, नई दिल्ली) ने अपने वक्तव्य में बताया कि फणीश्वरनाथ रेणु समाज एवं रचना के बीच आत्मीय संबंध बनाते हैं। रेणु अपने लेखन के माध्यम से समाज के यथार्थ को जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं। रेणु की राजनीतिक विचारधारा पर विस्तृत चर्चा उन्होंने कहा कि रेणु आंचलिकता का निर्माण भी करते हैं और उसका अतिक्रमण भी करते हैं। पूरे संतुलन के साथ रेणु अपने साहित्य में राजनीति के यथार्थ को उजागर करते हैं। इकहरा राजनीतिक दर्शन रेणु के साहित्य में देखने को नहीं मिलता।

दूसरे विशिष्ट वक्ता डॉ. एस बी एन तिवारी (आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने वक्तव्य में कहा कि रेणु को आजादी के पहले और आजादी के बाद की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। रेणु अपनी कहानियों में ग्रामीण जीवन के कथाओं के साथ-साथ शहरी जीवन के यथार्थ को भी उजागर करते हैं। रेणु की सामाजिक और राजनीतिक कहानियों के केंद्र में आम आदमी ही है।

तीसरी विशिष्ट वक्ता इला कुमार (कवि, उपन्यासकार, अनुवादक, उपनिषदवेता, नई दिल्ली) ने अपने वक्तव्य में कहा कि फणीश्वरनाथ रेणु की परती परिकथा वैश्विक स्तर की रचना है। उन्होंने परती परिकथा उपन्यास की सभी घटनाओं, पात्रों और दृश्यों की विस्तृत व्याख्या की। साथ ही उन्होंने परती परिकथा के कथानक, वातावरण, भाषा, बिंब, शिल्प, उद्देश्य आदि सभी विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. पुनीत बिसारिया ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा - फणीश्वरनाथ रेणु को समग्रता में देखने की आवश्यकता है। उन्होंने रेणु की कविताओं को समाज के यथार्थ से जोड़ा और उनके कवि रूप पर चर्चा की। साथ ही उन्होंने रेणु के नेपाल के आंदोलन में भाग लेने और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका एवं जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ने तक के सफर पर चर्चा की।

प्रतिभागी के रूप में अपने शोध पत्र का वाचन करते हुए नीरज झा ने रेणु के लोक साहित्य और उनकी भाषा पर अपने विचार व्यक्त किए। प्रतिभागी निशा ने कथेतर गद्य की दृष्टि से रेणु के साहित्य का वैशिष्टय विषय पर अपने शोधपत्र का वाचन किया।

सत्र का कुशल संचालन डॉ. सीमा पाण्डेय एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजेश चैधरी ने किया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. बाला लाखेंद्र (पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, बीएचयू वाराणसी) ने की।

विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रो. सुभाषचंद्र राय (प्रोफेसर हिंदी विभाग, विश्वभारती शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल) ने अपने वक्तव्य में कहा- फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व विराटता का समन्वय है। उनके साहित्य में मानवीयता, संवेदना, करुणा, राग- प्रेम अंतः सलिल प्रवाहित होती हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि रेणु  रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व से भी प्रभावित थे।

दूसरे विशिष्ट वक्ता प्रो. प्रमोद मीणा (प्रोफेसर हिंदी विभाग, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी, बिहार) ने अपने वक्तव्य में आदिवासी विमर्श के माध्यम से मैला आंचल उपन्यास की समीक्षा की। वक्तव्य में आपने कहा कि  रेणु ने अपने साहित्य में समाज के सभी तबकों चाहे वह गरीब हो, किसान हो, मजदूर हो, संथाल आदिवासी हो, सभी की समस्याओं को अपने साहित्य में स्थान है।हमें आज के संदर्भ में मैला आंचल की नई व्याख्या करनी होगी।

तीसरे विशिष्ट वक्ता अनंत जी (पत्रकार रेणु के अध्येता, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादक, पटना)  ने अपने वक्तव्य में तीसरी कसम कहानी के माध्यम से रेणु के विचारों को व्यक्त किया और इस कहानी के दो पात्रों हीरामन और हीराबाई पर विस्तृत चर्चा की।

डॉक्टर बाला लाखेंद्र ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में फणीश्वरनाथ रेणु के श्ठेसश् कहानी और उसके पात्रों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए रेणु के रचना संसार पर प्रकाश डाला। उन्होंने रेणु के विद्यार्थी जीवन और कृतित्व की चर्चा करते हुए उनके कथा संग्रह और उपन्यासों में दीर्घतपा, मैला आंचल, जुलूस आदि को महत्वपूर्ण बताया।

सत्र का संचालन रश्मि सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सीमा पाण्डेय ने किया।

वेब-संगोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रोफेसर रजनीश शुक्ल कुलपति,महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा थे और अध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर उमापति दीक्षित,अध्यक्ष, नवीकरण विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान थे। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. अलका सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती को समर्पित है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को निभाते हुए स्वाधीनता के स्वप्न को सृजित किया है। दो-दिवसीय राष्ट्रीय वेब-संगोष्ठी की व्यवस्थित रिपोर्ट डॉ. मीनू अवस्थी (एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,वसंत महिला महाविद्यालय) ने प्रस्तुत की।

समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. रजनीश शुक्ल,कुलपति, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि रेणु एक्टिविस्ट नहीं सृजनकार हैं। रेणु की सही दृष्टि एवं साहित्य की सही दिशा के मूल्यांकन की आवश्यकता है। आंचलिक भाषा विकास में बाधक नहीं साधक है। विकास और वृद्धि के वैचारिक भेद को बताने वाले  रेणु आने वाली शताब्दियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो.उमापति दीक्षित, विभागाध्यक्ष, नवीकरण विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि रेणु ने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज के विद्रूप चेहरे को प्रस्तुत किया है।

मनसा-वाचा-कर्मणा दिनों ही दृष्टियों से रेणु का जीवन,साहित्य प्रासंगिक है।

संगोष्ठी की परिकल्पना एवं उसके क्रियान्वन के लिए सजग एवं तत्पर रहने वाली डॉ. बंदना झा, संगोष्ठी-संयोजक एवं एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, वसंत महिला महाविद्यालय ने धन्यवाद-ज्ञापित करते हुए कहा कि रेणु ने विस्तृत फलक पर दुनिया को देखा और जिया है। यदि आप सशक्त हैं तो कोई भी आपको दरकिनार नहीं कर सकता है, रेणु इसका उदाहरण है। उनके भावुक कर देने वाले रेणु के देश राग से जुड़े वक्तव्य ने प्रतिभागी श्रोताओं और वक्ताओं को अंदर तक भिगो दिया।

समापन सत्र का कुशल-संचालन डॉ. प्रियदर्शिनी, असिस्टेंट प्रोफेसर,अंग्रेजी एवं भारतीय भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने किया। समस्त महाविद्यालय के सम्मिलित प्रयासों से यह वेब-संगोष्ठी फलीभूत हुई। दो दिवस के वेब संगोष्ठी में 20 से अधिक विषय विशेषज्ञों ने अपने वक्तव्य रखे। देश और विदेश से एक हजार से अधिक  प्रतिभागियों शोध छात्रों ने सहभागिता की।

 

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