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शोशण करने वालों की संख्या केवल दस प्रतिशत
November 13, 2019 • राजेन्द्र कुमार शर्मा


 
सम्पूर्ण विश्व में भारत एक अद्भुत एवं अनोखा लोकतांत्रिक देश है, जिसमें खाद्यान्नों से लेकर अन्य विशिष्ट प्रकार की प्राकृतिक आदि सम्पदायें अकूत मात्रा में पाई जाती है। ऐसे देश में प्रतिभायें भी बहुत हैं, किसी भी परिस्थिति आदि से अन्त तक लड़ने की व जीतने की विशेष क्षमता है। यह सब संभव हुआ है सिर्फ श्रम और श्रमिक कार्य से। क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और सिर्फ संभव हुआ है, श्रम से। इस देश का श्रमिक सदैव से उर्जा से भरा हुआ है। श्रम के तीन कोटि होती हैं, चाहे किसान के रूप में हो, चाहे मजदूर के रूप में हो और चाहे कलम से कार्य करने वाले कर्मचारी के रूप में हो। इन तीनांे ने देश का नाम रोशन किया है। किसी भी देश का अस्तित्व मानव और उसके श्रम से ही आंका जाता है। इसके लिए हम मजदूर दिवस भी मनाते हैं।     मगर किसी भी देश में यदि नेतृत्व सत्ताधारी या विपक्ष या छल-प्रपंच व झूठे वादों का दिलासा देकर जनता को विश्वास में लेकर बरगला कर लाभ का पद पाकर श्रमिक व श्रमजीवियों को उचित न्याय व अनुतोष नहीं दिया जाता है, तो ऐसे लोगों पर भी अंकुश का विशेषतः प्राविधान होना चाहिए। क्योंकि वायदों से जिन्दगियाँ नहीं फाइले चलती है। जमाने से जो श्रमजीवी हैं, उनका शोशण होता चला आ रहा है। और शोशण करने वालों की संख्या केवल दस प्रतिशत ही होगी? ये दस प्रतिशत लोग पूंजीपति, नेता और उच्चस्तरीय ए ग्रेड अधिकारी भी हैं। जो नब्बे फीसदी श्रमजीवियों का शोशण व दोहन करते चले आ रहे हैं। आखिर ऐसा नहीं होता तो भला आजादी के इतने वर्षो के बाद भी स्थिति श्रमजीवियों की ज्यो की त्यों ही क्यों बनी हैं प्रजातंत्र में राजतंत्र या महौल क्यों बना हुआ है। इस शोशित वर्ग की वतानुकुलित में सत्ता में पदों पर बैठकर योजनायें बनाकर मूर्तरूप नहीं दिया जा सकता। उनके दर्द और दुखों की कोई परवाह नहीं है। श्रमजीवियों को क्या आनुतोष लाभ या छूट दी जाती है, नेताओं की भी क्वालीफिकेशन व प्रतिबन्धतायें होनी चाहिए, बल्कि क्रियान्वयन भी होना चाहिए। अगर देश, समाज व सर्वहारा श्रमजीवियों का भारत बनाये रखना है। शिक्षा और चिकित्सा पर इतना खर्च हो रहा है कि आम जनता व श्रमजीवी समाज आय का आधे से ज्यादा खर्च कर रहा है। खाने व पीने की रोजमर्रा की चीजों में मिलावट की हद्द हो चली है। टैक्स और वेट आदि पर अंकुश नहीं हैं ये तमाम सारी बातें श्रमजीवियों पर ही लागू है। आखिर नेताओं पर क्यों नहीं। कही पर कुछ भी टिप्पणी करें कोई बात नहीं मगर एक श्रमजीवी कुछ मांगे या तो दस पुश्तों तक रिकार्ड छानकर कार्यवाही की जाती है। हर बात के लिए परमीशन टैक्स प्रतिबधता। सरकारे पद देश, समाज, जनता, श्रमजीवियों व सीमाओं को सुव्यवस्थित व्यवस्था के सुदृढ़, मजबूत बनाने व सुरक्षा प्रदान करने हेतु होती है न कि उनके मनोबल को गिराने व कमजोर करने के लिए बनाई जाती है। जब आम श्रमजीवी जनता की सारी चीजों की जाँच होती है तो जो पद व सत्ता पाने के बाद उनकी जाँच हो तत्काल कार्यवाही हो। और सर्वजनिक खुलासा हो, केंकि जब नेतृत्व पाक-साफ होगा, तभी किसी को मार्गदर्शक हो सकता है। और जो भी ए ग्रेड में सरकारी ब्रदर है वो भी पहले लोकसेवक की परिभाषा का परिपालन करे। क्योंकि जो बी ग्रेड के नीचे पुलिसकर्मी है उनकी चैकी स्पष्ट है कि ड्यूटी है तो आखिर वो कुछ आराम करेंगे। नेता तो सोते रहते है यात्राओं में भी। अगर ये न सोते तो जनता भी सो सकती थी। आने वाले वक्त में अब चुनाव श्रमजीवी समाज ठीक से केगा। और तब पता चलेगा कि श्रमजीवी समाज बोलता कम, काम ज्यादा करता है। श्रमजीवी समाज जिन्दाबाद!