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सूर्य और चन्द्रमा के पिरामिड बनाये थे
November 13, 2019 • पं. के.के.तिवारी

दक्षिण अमेरिका के गुआटेमाला, बेलाइज, तथा मेक्सिको के देशों में एक अति प्राचीन सभ्यता के अवशेष पाये गये हैं। इस सभ्यता का विकास ईसा से 2500 वर्ष पूर्व हुआ व नवीं सदी तक होता रहा। यह सभ्यता कृषि, व्यापार, गणित, खगोल विज्ञान व भवन निर्माण में अद्वितीय थी। उनका खगोल ज्ञान आज के वैज्ञानिकों को आश्चर्य में डाल देता है। उनके पुजारी समय व ऋतुओं का हिसाब-किताब गणित व खगोल विज्ञान के आधार पर बिना किसी त्रुटि के कर लेते थे। कापेन, पालेक, टिकल, उक्समाल, चिचेनइत्सा, तियुतिहु आकान इस सभ्यता के प्रमुख नगर थे। सैन्य अभियानों, राजकार्यों, कृषि तथा धार्मिक उत्सवों के लिये उन्हें मौसम, पूर्णिमा अमावस्या सूर्योदय, सूर्यास्त तथा अन्य खगोलीय गणनाओं की आवश्यकता होती थी। वे अनेक साधनों व यंत्रों द्वारा इसकी गणना करते थे। उनकी एक  वेधशाला 'एल कारकाॅल' चिचेनइत्सा शहर में पाई गई है। तथा तियुतिहु आकान जो उनकी धार्मिक राजधानी थी वहाँ सूर्य व चन्द्रमा के पिरामिड पाये गये हैं। एल कारकाॅल प्राचीन भवनों के समूह में स्थित है। इसका निर्माण कई चरणों में हुआ। इसका प्रथम चरण नवीं सदी के अन्त में संक्रमण काल में हुआ। इस निर्माण में ऊंचा आयताकार चबूतरा बना जिसमें पश्चिम की ओर कई सीढियां बनाई गईं। इस प्लेटफार्म के उपर लगभग 48 फुट उंचें एक गोलाकार टावर का निर्माण हुआ। जिसका आधार ठोस पत्थरों का है। बीच के भाग में दो गैलरियां हैं। तथा टावर के अंदर उपर जाती चक्राकार सीढियां है। जो सबसे उपर एक निरीक्षण कक्ष तक जाती है। निरीक्षण कक्ष में निरीक्षण हेतु चार कोने व चार उप कोने में खिड़कियां बनी हैं। वहाँ एक क्रासनुमा लकड़ी का यंत्र भी पाया है। जो आज भी आकाश निरीक्षण का कार्य करता है। द्वितीय चरण के निर्माण में एक वृत्ताकर चबूतरा बना उसके उपर एक आयताकार चबूतरा और बनाया गया। प्राचीन माया दस्तावेजांे व नवीन अध्ययन से पता चलता हैं कि इससे शुक्र, सूर्य, चन्द्रमा व अन्य खगोलीय पिण्डों का अध्ययन किया जाता था। इस वेधशाला में दक्षिणी पच्छिमी दिशा में 27-5 फुट उँचाई पर तीन छेद है। जिनसे शुक्र ग्रह की गति का अध्ययन किया जाता था। कि कब वह स्थिर होगा। इस वेधशाला के सर्वोच्च कक्ष से आकाश व आस-पास की भौगौलिक संरचना का शानदार नजारा दिखाई देता है। शुक्र माया वासियों के लिये अति महत्वपूर्ण ग्रह था वे इसे युद्ध का देवता मानते थे। वे इसे सूर्य का जुड़वा मानते थे। और इसकी स्थिति परिवर्तन के आधार पर युद्ध व हमले की योजना बनाते थे। एल कारकाॅल के सामने का सीढीनुमा भाग उस क्षेत्र में स्थित अन्य भवनों की बाहरी पच्छिमी रेखा के उत्तरी बिन्दू से 27-5 अंश पर स्थित है। जो शुक्र की सर्वोच्च उत्तरी स्थिति से सटीक मिलान करता है। तथा भवन के उत्तर पूर्वी व र्दिक्षणी पूर्वी कोने ग्रीष्मकालीन सबसे बड़े दिन के सूर्योदय व शीतकालीन सबसे छोटे दिन के सूर्यास्त से संबध बनाते हैं। मायावासी अनेक प्रकार के कलैण्डर बनाते थे। उन्होने एक साल में 20-20 दिन के 18 माह निर्घारित किये थे। वे 360 दिन के साल को टून कहते थे। 20 टूनों (सालों) 72,00 दिन का एक काटून होता था। तथा 20 काटून (400 सालों) या 1,44,000 दिनों का एक बाकटून होता था। एक अलटून में 23,0400 लाख दिन होते थे। उनके खगोलीय व धार्मिक कलैण्डर अलग-अलग थे। माया खगोलज्ञ 11,960 दिनों में 40 पूर्णमासी की गणना करने में सफल हो गये थे। जो आधुनिक एस्ट्रोनाॅमर की गणना से प्रतिवर्ष मात्र 5 मिनट ही अधिक है। वे किसी भी ग्रह की सूर्य की परिक्रमा में लगने वाले समय की गणना गिना किसी यंत्र के कर लेते थे। उनका वेनुसियन (शुक्र ग्रह) वर्ष 584 दिन का था। जिसमें आज के वेनुसियन वर्ष से मात्र 12 सेकेंड का अंतर है। इसी सभ्यता की एक महत्वपूर्ण नगर तियुतीहु आकान था। जो मायावासियों की धार्मिक राजधानी थी। 5वीं सदी में 8 बर्गमील के क्षेत्र में फैले इस नगर में 2 लाख लोग रहते थे। 150 ईसवी में नगर की उत्तर दिशा में इन लोंगों ने सूर्य और चन्द्रमा के पिरामिड बनाये थे। तथा क्वेटजेटकोटल पंखदार सर्प का मंदिर बनाया। इनसे कलैण्डर बनाये जाते थे। इन्हें विषुव दिन का ज्ञान था। जब दिन-रात बराबर होते हैं। वे इसे प्रतीक रूप में मानते थे कि साल के इन दों दिनों में पंखदार सर्प हामसम था। उतरी अमेरिका की मट्टी की वेधशाला-उत्तरी अमेरिका में मिसीसिपी, मियामी, ओहियो जैसी नदियों के उपर वहां के आदिवासियों द्वारा निर्मित हजारों टीले, पहाड़ियां हैं। सर्प, पशु-पक्षियों की आकृति के ये टीले  45 से.मी. से 2 मीटर तक उँचे हैं। इनके अवशेष जार्जिया तक मिलते हैं। वहां कि आदिवासी इन टीलों की रक्षा करते हैं। इनकी कोई स्पष्ठ व्याख्या नहीं मिलती हैं। कुछ इसे दानवों द्वारा निर्मित मानते हैं। वैसे यहां दानवों के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैंे। वहां भालू, कबूतर, बाघ तथा सर्पाकार टीलों की लंबी श्रंखला हैं। पुरात्ववेत्ता विलियम पिडजियन ने अपनी पुस्तक 'टेªडिशन आॅफ डे कू डाह' में टीलों के बारे में कुछ रहस्यमय जानकारी आदिवासियों के देवतुल्य पुरूष डे कू डाह से प्राप्त की थी। जिसे पिजडियन पूरी तरह समझ नहीं सका। देवदूत के अनुसार उसके पूर्वजों ने पृथ्वी पर इन प्रतीकों द्वारा इतिहास लिखा है। पहले उनके पूर्वज सर्पपूजक थे। धीरे-धीरे सूर्य, चन्द्र व ग्रहोें की पूजा करने लगे। आकाश पिंडों का प्रतिनिधित्व देवता करते थे। और ये टीले ग्रह,नक्षत्रों के देवताओं का प्रतिनिधित्व करते थे। विभिन्न आकृतियां पशु, पक्षी विभिन्न ग्रहों व देवताओं के के प्रतीक हैं। यह टीले रेड इंडियन्स के लिये खगोलीय कलैण्डर का काम करते थे। इनमें आहियो एडम्स काउण्टी का टीला 382 मीटर लंबा है।  पिडजियन ने इसका मुंह से लेकर दुम तक इसका निरीक्षण किया। पिडजियन ने इसे खगोल का प्रतीक माना हैंे। कांसाम के टी.एन. कोनान के अनुसार सर्प प्रतीक वाले टीले व अन्य टीले का निर्माण तारामंडल के ढांचे के आधार पर हुआ है। विश्व के अनेक भागों में चन्द्रग्रहण को अजगर द्वारा वन्द्रमा को निगलना माना जाता है। कोनान के अनुसार सर्प टीले की सात कुडंलियां तथा इसकी दुम सप्तर्षि के सात तारों तथा ध्रुव तारे के चारों ओर उनकी परिक्रमा के प्रतीक हैं। प्रो. राबर्ट डब्लु हीर्नर ने 1977 मे फेट पत्रिका मेें अपना भयानक अनुभव पेश किया है। उनके अनुसार जाड़े के एक दिन जब वे एक टीले पर खड़े थे। तो उनके मन में भयानक आतंक, अवसाद पैदा हुआ। उन्हें भारी मनहूसियत का आभास हुआ। उनके चारों ओर भयानक बवंडर पैदा हो गया व चारों ओर पत्तियाँ नाचने लगीं। उन्हें खौफ से गश आ गया जब वे कुछ संभलें तो फिर वहां कभी ना आने का फैसला करके अपनी कार तक वापस आ गये।