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सुख और दुःख
January 19, 2020 • स्वामी ज्योतिर्मयानन्द

जीवन-सरिता सुख-दुःख के दो किनारों से ही पूर्णता के सागर की ओर प्रवाहित होती रहती है। जिस प्रकार मनुष्य में सुख-प्राप्ति की अन्तर्निहित कामना है, उसी प्रकार सभी जीवों उद्भिज्ञों, कीड़ों तथा पशु पक्षियों में भी सुख की तीव्र कामना तथा दुख के प्रति नैसर्गिक घृणा भरी हुयी है।
एक चीटीं चीनी की एक कण प्राप्त कर, एक गरीब व्यक्ति थोड़ा से धन प्राप्त कर तथा राजा किसी राज्य पर विजय प्राप्त कर समान तृप्ति सुख का अनुभव करते हैं। एक चींटी तथा राजा में केवल मनोविकास का ही अन्तर है, उनके तृप्ति सुख में कोई अन्तर नहीं।
जिस प्रकार मनुष्य आपत्ति से बचने के लिए, अपनी जीवन रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी कठिनाई को तैयार रहते हैं, उसी प्रकार अन्य जीव भी। अन्तर केवल इतना ही है कि मनुष्य में धर्म-अधर्म की बुद्धि है, मनुष्य में विचार शक्ति के द्वारा आत्म-साक्षात्कार प्राप्ति की क्षमता है जबकि कीट पतंगों तथा पशु-पक्षियों में ऐसी क्षमता नहीं है।
जब जीवन-सरिता आत्मा सागर में विलीन हो जाती है तथा सुख-दुख के दण्ड का अतिक्रम हो जाता है अपार असीम आनन्द में आत्माा निमग्न हो जाती है यही जीवन का एकमेव लक्ष्य है।ं