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तफतीश
November 13, 2019 • धीरेन्द्र सिंह

25 जनवरी 1955 की वह खौफनाक और दशहत भरी रात मै जिंदगी भर नही भूल सकता हूँ। आज भी उसे याद करके मेरी रूह कांप जाती है। वो क्या था लाख सोचने के बाद भी मैं आज तक समझ नही पाया हूँ बात करीब चालीस साल पुरानी है। उन दिनों मैं लखीमपुर जिले की गोला पुलिस चैकी का ईन्चार्ज था, यह एक शांतप्रिय और कृषि प्रधान ईलाका था आबादी बहुत थोड़ी होने के कारण जुर्म काफी कम होते थे गांव काफी दूर-दूर बसे थें कहीं-कहीं तो यह दूरी पांच से दस कोस तक थी सारा ईलाका बागों और घने जगलों से घिरा था दोपहर के करीब चार बजे थे पिछले कई दिनों से मौसम बड़ा खराब था शीत लहरी चल रही थी हफ्ते भर से सूरज नही निकला था कड़क जाड़े की की सर्द दोपहर मे मैं गर्म चाय की चुस्की लेते हुये कुछ सरकारी कागजात देख रहा था तभी एक अधेड़ उम्र के आदमी ने आकर कहा, हुजुर मैं बधेरा गांव का चैकीदार राम सिंह हूँ गांव के छोटी देवी के मंदिर के पास वाले मकान मे मोहन सिंह का खून हो गया है। संगीन जुर्म का मामला जान कर मंै आपको खबर देने चला आया मैंने देखा कि वह करीब चालीस साल का सांवले रंग का ठिगना और दुबला-पतला आदमी था उसके चेहरे पर घने चेचक के दाग थे मारे डर के वह बदहवास सा हो गया था मैंने उसे चाय पिलवाई और उसे हिम्मत बंधाते हुये पूरी बात तफसील से बताने को कहा कुछ सामंाय होने पर उसने कहा हुजुर मैं बघेरा गांव का बाशिंदा हूँ मेरी थोड़ी सी काश्तकारी है। बाकी वक्त मे मैं गांव के जानवर चराता हूँ आज दिन के करीब तीन बजे मेरी एक बकरी छोटी देवी के मंदिर के पास बने मकान मे घुस गई मै उसे वापस लाने मकान मे गया मकान के दरवाजे पट खुले थे अंदर का नजारा देखकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गई सामने कुर्सी पर एक लाश पड़ी हुयी थी उसकी गर्दन पर किसी चीज का गहरा घाव था उसका सारा शरीर खून से लथपथ था उस भयानक नजारे को देखकर मै थर-थर कांपने लगा किसी तरह मैंने खुद को संभाला और तुरंत कत्ल की खबर देने आपके पास चला आया मैंने उसके बयान के आधार पर अगंूठा लगवा कर रिपोर्ट दर्ज कर ली इन सब कार्यवाही मे करीब घंटा लग गया सूरज डूब चुका था कोहरा आज शाम से ही छाने लगा हल्की हवा चल रही थी गलन वाली ठंडक काफी बढ गई थी मेरा नाम प्रकाश नारायन सिंह है। मैं सीतापुर जिले की सिधौली तहसील के अटरिया गांव का रहने वाला हूँ आठ साल पहले बतौर दरोगा मे पुलिस मे भर्ती हुआ था मुझे इस चैकी मे आये हुये सिर्फ पांच महीने ही हुये थे चैकी मे पांच आदमी का स्टाफ था, जिनमे दो लोग छुट्टी पर गये हुये थे मैंने अपना लांगकोट पहना सरकारी टाॅर्च और सिपाही तुलसीराम को साथ लेकर मौाकाये वारदात पर चल पड़ा रास्ता कच्चा उबड़-खाबड़ और घने पेड़ों से घिरा था कोहरेे और पेड़ो के कारण काफी अंधेरा फैल गया था गहरा सन्नाटा छाया हुआ था जिसके कारण रास्ते मे हमें कोई आदमी तो क्या जानवर भी नजर नहीं आया जब हम लोग गांव की सीमा पर पहुँचे तो शाम के छह बज चुके थे तभी हमे सिर पर मफलर और बदन पर कंबल लपेटे एक बूढा आदमी नजर आया मैंने उससे महान सिंह के मकान के बारे मे पूछा वो हमे हैरत से ऐसे देखने लेगा जैसे उसने भूत देख लिया हां उसंे खामोश देखकर मैंने उससे छोटी देवी के थाने के बारे मे पूछा तो उसने बताया सामने दांयेे हाथ की पगडंडी से आगे जाने पर एक आम का बाग मिलेगा उसके पच्छिमी छोर पर देवी का मंदिर है। मंदिर पहुँचने पर हमने पाया कि यह पीपल के एक बेहद पुराने पेड़ के नीचे एक चबूतरे पर पक्की ईंटो से बना एक छोटा सा ताकनुमा मंदिर था जिसमे जिसमे किसी देवी की अनगढ सी कोल रंग की मूर्ति थी ताक मे दिया जल रहा था मंदिर के बांये हाथ पर करीब दो सौ कदम आगे घने पेड़ो से धिरा एक पुराने ढंग का खंडहरनुमा दुमंजिला मकान नजर आया मकान एक ऊँचे प्लेटफाम पर स्थित था उसके सामने के भाग मे एक बरामदा था बरामदे के बाद तीन महराबदार दरवाजे थे बीच का दरवरजा सबसे बड़ा भारी और बाकी दरवाजो से ऊँचा था जिसके दोनों ओर की दीवारो मे ताके बने हुये थे दूरी मंजिल पर कोई दरवाजा नही था केवल कुछ खिड़कियां बनी थी मकान का दरवाजा खुला हुआ था अंदर काफी अंधेरा था टार्च की रोशनी के सहारे हम अंदर घुसे वहाँ हाॅल मे एक ओर भारी मसहरी रखी हुयी थी और बीच में एक बड़ी सी गोल मेज थी जिसके चारों और कुछ कुर्सियां रखी थीं एक कुर्सी पर एक आदमी की बैठी अवस्था मे लाश पड़ी हुयी थी उसके गर्दन के पिछले भाग मे एक बड़ा सा घाव था जो किसी तलवार या गड़ासे का लगता था शायद किसी ने पीछे से गर्दन पर भरपूर वार किया था जिसका मकतूल को जरा भी अंदाजा नही था पास एक तिपाई पर बुझी हुयी लालटन रखी जिसे तुलसीराम ने जला दिया मकतूल 50-52 साल का मजबूत बदन का आदमी था जिसने मंहगें जूते गरम पैन्ट और बंद गले का कोट पहना हुआ था मैने आवश्यक कार्यवाही की और चैकी की तरफ चल दिया रास्मे मे मैने दांये हाथ पर जलती हुयी आग देखी पास जाकर देखा अजीब सी भयानक शक्ल सूरत के दो आदमी आग ताप रहे थे उन्हें इस वीराने मे आग तापते देखकर मुझे थोड़ी शंका हुयी कि कहीं ये कोई मंलजिम ना हो मुझे देखकर उन्होने राम-राम की और पूछने पर बताया कि वे मुसाफिर है। और ठंड से बचने के लिय आग ताप रहे है। उनके जवाब से सन्तुष्ट होकर मंै कुछ ही आगे बढा था कि किसी आदमी की दद्रनाक चीख सुनाई दी हाय मार डाला मैने सोचा कि जरूर उन मुसाफिरों पर केाई मुसीबत टूट पड़ी है। मैं और तुलसीराम वहां पहुचे तोे वहां का नजारा देखकर दिमाग ही चकरा गया ना वहां केाई आदमी था ना ही कोई आग जल रही थी जली लकड़ी या राख किसी का वहां नामोनिशान तक ना था अजीब माजरा देख के मारे घबराहट के मेरा दिमाग सुन्न हो गया तुलसीराम की हालत तो मुझसे भी बुरी थी तुलसीरारम ने कहा साब यह सब प्रेतलीला है। तुरन्त यहाँ से निकल चलिये हम लोग हनुमान चालीसा पढ़ते हुये हुये किसी तरह चैकी पहुँचे और सोने चले गये अगले दिन मैंने हेडक्वाटर से पुलिस फोटोग्राफर, डाॅग स्क्वायड और पोस्टमार्टम हेतु वैन मंगवा ली अगले दिन 11 बजे छोटी देवी के मंदिर पहुँचंे तो जो देखा उससे वहाँ हमारा दिमाग ही घूम गया मुझे लगा कि मैं पागल हो जाऊँगा वहां मंदिर, बाग कुंआ सब मौजूद था लेकिन वहां ना तो मकान था ना मोहन सिंह की लाश। उस जगह पर एक बहुत पुराना नीम का पेड़ जरूर था मैने और तुलसीराम ने खुद अपनी आँखों से कल रात मकान उसकी हर चीज और मोहन सिंह की लाश देखी थी चैकीदार का सूचना देना बुढ्ढे का मंदिर का रास्ता बताना, सब कुछ नजर का धोखा तो नही हो सकता पुलिस डाक्टर, फोटोग्राफर, डाॅग स्क्वायड वाले सब मुझे गुस्से से खरी खोटी सुना कर लौट गये मैं भी लौट आया अगले दिन मैं सूचना देने वाले की तलाश मे गांव गया तो गांव के मुखिया और देहातियों से मेरी बात पर हैरानी जताते हुये बताया कि राम सिंह नाम का तो कोई आदमी गांव मे ही नही रहता है। ना ही आपकी बताई हुलिया वाला कोई और आदमी राम सिंह के बारे मे गांव मे कोई कुछ नही बता सका हाँ वो बुढढा जरूर मिला जिसने मुझे छोटी मंदिर का पता बतलाया था उसने मुझसे कहा कि मैने केवल आपको छोटी मंदिर का पता बताया था किसी मकान के बारे मे नही गांव वालो ने बताया कि वहां कभी कोई मकान नही था केवल एक पुराना नीम का पेड़ है। मुझे मेरे सवालों के जवाब नही मिले यह बात मेरे लिये एक रहस्यमय पहेली बन कर रह गई एक सप्ताह बाद कप्तान साहब के यहां से मुझे एक आॅडर मिला जिसमे मुझे विभाग को गलत सूचना देने के ईल्जाम मे पन्द्रह दिनों के लिये मुअत्तल कर दिया गया था इन सवालों के जवाब मुझे सतरह साल बाद 1972 मे बहुत ही अजीबो-गरीब तरह से मिले उन दिनों मेरी पोस्टिंग हरदोई के सण्डीला थाने मे थी मेरे एक सहायक इन्सपेक्टर गुरू शरणलाल श्रीवास्तव जो लखनऊ के ठाुकरगंज मोहल्ले के पुश्तैनी निवासी थे के छोटे भाई की शादी का निंमत्रण मुझे मिला जिसमे उन्होंने मुझे सापरिवार आने के आगह किया हम लोग नियत समय पर वहां पहुँचे वहां लगे एक ग्रुप फोटो को देखकर मैं चैक गया उसमे मेरे मित्र के पिता जो सेवा निवृत्त सैन्य अधिकारी थे के साथ दो अंय फौजियों की फोेटो लगी थी उनमे से एक फोटो उसी मकतूल की थी जिसकी लाश मैने बघ्ेारा गांव मे देखी थी मैने अपने मित्र के पिता को पूरी बात बताई तो उन्होंने बताया कि वह व्यक्ति लांस नायक मोहन सिंह था जो उनके साथ ब्रिटिश फौज मे था और द्वितीय विश्वयुद्ध मे लड़ा था वह लखीमपुर की खीरी तहसील के मगट गांव का निवासी था वहां उसकी काफी जमीन जायदाद थी जंग खत्म हो चुकी थी सब अपने अपने घर लौट चुके थे उसके पांच छह साल बाद किसी से पता चला कि एक रात मोहन सिंह की किसी ने उसके सर पर तेज धारदार हथियार से उसकी हत्या कर दी सारी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गया सन् 1975 मे मैं किसी काम से खीरी गया तो मगट गांव भी गया वहां यह देखकर मेरे हैरत की सीमा नही रही कि मोहन सिंह का मकान अंदर और बाहर से हूबहू वैसा ही था जैसा मैंने उस रात बघेरा गांव मे देखा था किस्मत से उस वक्त  मेरे साथ मेरा कैमरा भी था जिससे मैने मकान के अंदर बाहर के कई फोटो भी खंीचेे पर यह कैसे संभव है। इसका जवाब मुझे आज तक नही मिला मगट के लोगों का कहना है ंकि मोहन सिंह अविवाहित थे उनकी हत्या उनके सौतेले भाई ने जायदाद के लालच मे की थी वह पकड़ा गया था और उसे उम्रकैद की सजा भी हुयी थी मोहन सिंह मर कर प्रेत बन गये है। अक्सर जनवरी की सर्द कोहरी भरी वीरान रातों मे मकान मे उनकी लाश कुर्सी पर बैठी नजर आती है इन्सपेक्टर प्रकाश नारायण सिंह मेरे पडोसी और मेरे मित्र वीरेन्द्र सिंह के पिता थे उन्होंने मुझे खुद सारा किस्सा सुनाया था और उस मकान के फोटो भी दिखाये थे 1994 मे 75 वर्ष की उम्र मे प्रकाश नारायण सिंह का निधन हो गया मगट गांव मे खड़ा मोहन सिंह का मकान आज भी उस घटना की गवाही दे रहा है।
यह रहस्य-रोमांच कहानी काल्पनिक है