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विनाश की भविष्यवाणी
January 16, 2020 • राजेन्द्र सिंह गौतम

यह विचित्र ज्योतिष घटना 19 वीं सदी के छठे दशक में घटी थी पेप्सू स्टेट के पंचकूला क्षेत्र के घग्घर नदी के मुहाने पर बसे मनौता गाँव मंे प. काशीराम नामक अत्यंत सम्पन्न और प्रख्यात ज्योतिषी रहा करते थे। वे सैकड़ों बीघा उपजाऊ जमीन के मालिक भी थे। उनके इकलौते पुत्र पण्ड़ित रिखीराम भी अपने पिता की तरह प्रख्यात ज्योतिषी थे। पण्ड़ित रिखीराम की दो संताने पुत्र हरबंस और पुत्री घनदेई थी पण्ड़ित काशीराम की उम्र 81 साल और पण्ड़ित रिखीराम की आयु 55 साल थी सन् 1856 के सावन की एक दोपहर मे आसमान पर बादल छाये घने थे और रह रह कर बारिस हो रही थी दोनो बाप बेटे अपनी ज्योतिष की बैठक मे ज्योतिष की गणना कर रहे थे। अचानक पण्ड़ित काशीराम ने कहा बेटा दूसरों का भाग्य बांचते-बांचते बुढ़ापा आ गया परन्तु हमने कभी अपना और अपने परिवार का भविष्य बांचने की कोशिश नही की, आज हम दोनों अपना और अपने परिवार का भविष्य टटोलते हैं। दोनों बाप-बेटे अपने पोथी-पत्रा लेकर अलग अलग ग्रह गणना करने लगे गणना करते करते शाम हो गई। अंधेरा छा गया ताकों मे दिये जल उठे। कई घंटो बाद जब गणना पूरी हुयी तो उनके चेहरे लटक गये बाहर मूसलाधार बारिस हो रही थी तभी भयानक बिजली कड़की और पड़ोस का कच्चा मकान भरभरा कर ढह गया पण्ड़ित काशीराम बोले बेटा ना हमारा और हमारे परिवार का भविष्य अच्छा है ना मकान ढहने का यह शकुन। रिखीराम बोले मेरी भविष्यगणना भी भविष्य मे भयानक दुर्भाग्य की बात कह रही है। दोनों ने जो भविष्य देखा था वह यह था कि उनकी विशाल जमीन, जायदाद अभिशाप बन कर उनके परिवार के विनाश का कारण बनेगी। और वर्तमान पीढ़ी के बाद उनका वंश नष्ट हो जायेगा काशीराम बोले बेटा कोई उपाय ढंूढो। दोनों उपाय ढंूढते रहे। शाम से रात हो गई। फिर रिखीराम ने कहा पिताजी केवल एक उपाय है। आप दूसरी शादी कर लीजिये और मुझसे और इस पुश्तैनी जमीन जायदाद से नाता तोड़ लीजिये लेकिन इस उम्र में शादी काशीराम ने प्रतिरोध किया तो रिखीराम बोले आपकी पत्री कहती है कि आपकी दूसरी शादी हो जायेगी पण्ड़ित काशीराम ने काफी ना नुकुर की किन्तु रिखीराम अड़े रहे उन्होने तर्क दिया कि यदि पत्री मे वंशबेल विनाश वाली बात सच होगी तो आपकी दूसरी शादी व उससे संतान वाली बात भी सच होगी। काफी जददा़ेजहद के बाद काशीराम बुढापे मे शादी करने को तैयार हो गये लेकिन 81 वर्ष की उम्र मे ना तो शादी होना संभव था और ना ही संतान की प्राप्ति। किन्तु विधी की जो रेखा रिखीराम ने कुण्डली मे देखी थी उससे काफी उम्मीद थी। काफी दौड़ के बाद पड़ोस के नालेट्टेड़ी गाँव की 22 वर्षीय युवती ठाकरी से उनका विवाह सम्पन्न हो गया और ठाकरी से शादी करते ही उन्होने रिखीराम और खानदानी जमीन, जायदाद से पूरी तरह नाता तोड़ लिया शादी के 2 वर्ष बाद विघी की रेखाओं के जाल मे छिपा नतीजा सामने आया ठाकरी एक पुत्र की माँ बन गई। पुत्र का नाम द्वारकादास रखा गया।
 समय गुजरता गया 1886 मे 101 वर्ष की उम्र मे पण्ड़ित काशीराम का देहान्त हो गया तभी विनाश की घड़ी आ गई पिता की मृत्यु के बाद पण्ड़ित रिखीराम का भी देहान्त हो गया फिर उनके बेटे हरबंस की अविवाहित अवस्था मे मृत्यु हो गई और पुत्री घनदेई और उसके पति चल बसे धनदेई निः संतान थी इसके साथ ही वह वंशबेल समाप्त हो गई। इधर द्वारकादास बड़े हुये तो उनकी शादी जिला रोपड़ के काईनौर गाँव की प्रज्ञादेवी के साथ हो गई यद्यपि उन्होने पुश्तैनी जमीन से कोई नाता नही रखा था फिर भी खानदानी शाप की काली छाया ने उन्हें घेर लिया प्रज्ञादेवी एक-एक करके 10 बच्चों की माँ बनी लेकिन सभी बच्चे पालने मे ही मर गये ज्योतिषयों और ओझाओ ने बताया कि खानदान पर कोई पुराना शाप है जिसे हटाना उनके बस की बात नही है उन्हें लगा कि उनकी वंशबेल यही पर समाप्त हो जायेगी उन दिनों पंचकूला के बदछौही गाँव के पास एक टीले पर एक साधू बाबा रहते थे जो बदछौही वाले बाबा के नाम से मशहूर थे। किसी से पता पाकर द्वारकादास सपत्नी उनकी शरण मे गये सारी बात सुन कर बाबा ने प्रज्ञादेवी से कहा पत्थर खाने होंगें खा सकोगी प्रज्ञादेवी देवी बोली इस अभिाशाप से मुक्ति के लिये मैं पत्थर भी खाऊगी बाबा बोले ठीक है। किसी दिन ब्रह्म मूहुर्त मे आओ एक दिन द्वारकाादास प्रज्ञादेवी समेत ब्रह्म मूहुर्त मे टीले पर पहुँचे उन्हें देखते ही बाबा ने प्रज्ञादेवी पर
पत्थर फेंकने शुरू कर दिये पत्थ्रों की मार से उनकी देह लहूलुहान हो गई किन्तु वे पत्थरों की परवाह किये बगैर पत्थर खातीं बाबा तक पहुँचीं। सर से खून बह रहा था तभी बाबा ने उन्हें उठा कर आर्शीवाद देते हुये गंभीर स्वर मे कहा भाग जा जा भाग जा तू पुत्रवती होगी तेरा पुत्र चिरंजीवी होगा प्रज्ञादेवी अचेत हो गई पीछे खड़े द्वारकादास उन्हें घर लाये साधू का बचन सत्य निकला 1908 मे प्रज्ञादेवी एक पुत्र की माँ बनी बेटे का नाम प्यारे लाल शर्मा रखा गया अभी वह 3-4 माह का ही था कि द्वारकादास का देहान्त हो गया प्रज्ञादेवी मनौती छोड़ कर अपने मायके काईनौट आ गई 1936 मे प्यारेलाल डी. ए. वी. कालेज, जलंधर मे लैक्चरर हो गये 1937 मे ंउनका विवाह सत्यवती से हो गयी वे सात बेटे बेटियों के पिता बने आगे चल वे भारत के विख्यात लेखक बने चलती फिरती दीवरों, बन्दा बैरागी, लहरों से पूछिये उपन्यास, चन्दलोक की यात्रा, मै कुछ सोच रहा हूँ काव्य संग्रह, फिल्म मेरे हजूर की पटकथा, प. जवाहर लाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, संजय गांधी की जीवनियां, इंडिया ब्रिगेड, वल्डर्स वाइजेस्ट विजर्ड, इंडिया द वल्र्ड इम्मारेलिटी आदि पुस्तके लिखीं।