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विश्वासघात
January 31, 2020 • -डा. राजेन्द्र सिंह गौतम

यह अपने आप मे एक अजीबों गरीब केस था यह कोई नही जानता कि किस्मत ने उसकी जिंदगी में क्या क्या राज छुपा रखे हैं। कभी-कभी इंसान भाग्य के हाथों मजबूर होकर किस्मत की कठपुतली बन जाता है। और राजपाठ, पद सम्मान छोड़कर दर-दर की ठोकरें खाता है। ऐसा ही कुछ हुआ असम के मशहूर जज उपेन्द्र नाथ राजखोवा के साथ। वे एक मेघावी छात्र, स्वतंत्रता सेनानी, सम्मानित, न्यायप्रिय जज, एक बेरहम हत्यारा, एक सजायाफता मुजरिम बने। राजखोवा जंम सन् 1910 मे डिब्रूगढ़ मे एक ब्राह्मण परिवार मे हुआ था जंम के समय ही उनकी माँ चल बसी थी माँ की मौत के कुछ ही समय बाद उनके पिता योगेन्द्र नाथ भी एक आकस्मिक दुर्घटना मे मारे गये थे उनके चाचा ने उनका पालन-पोषण किया था अपनी कालेज लाइफ मे वह सच्चरित्र और मेघावी छात्र थे कानून की पढाई दौरान उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन मे भाग लिया और वे कई बार जेल भी गये थे। सौभाग्य से वे जज बन गये सांवले रंग के राजखोवा का विवाह गोलाघाट के संभ्रान्त परिवार की अत्यंत सुन्दर कन्या पुतल देवी से हो गया समय के साथ वे तीन पुत्रियों निर्माली या लिनू, जोनाली या लूना तथा रूपाली या भान्तु या रूपलेखा के पिता बन गये जहां जज साहब हंसमुख, दयालु, मृदुभाषी, और संवेदनशील इंसान थे वहीं पुतली या पुतुल देवी तीखे स्वभाव की महिला थीं किसी कैदी को सजा देते हुये उसके परिवार वालों की दुर्दशा सोच कर उनकी आंख में आंसू आ जाते थे। बीबी के कहने पर वे किसी नौकर को निकालते तो उसकी अंय नौकरी की व्यवस्था वह पहले ही कर देते थे सभी कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक उनके जीवन मे नाटकीय मोड़ आने लगे साल 1969 में जब मे घ्रूवी मे मजिस्ट्रेट थे तभी उनकी भेंट बंगाल के एक प्रसिद्ध ज्योतिषी से हुयी लोगों के आग्रह पर उन्होने ने भी ज्योतिषी से अपना भाग्य विचरवाया ज्योतिषी ने उनका हाथ देखकर  उनके जज होने तथा घर परिवार के संबध मे कई सही भविष्यवाणियां की तभी उसने कहा कि आपको जीवन मे सब कुछ प्राप्त होगा किन्तु संतान सुख नही मिलेगा उन्होने ज्योतिषी से कहा कि कृपया एक बार फिर ध्यान से मेरा हाथ देखें फिर बतायें ज्योतिषी ने कहा मेरी बात सौ फीसदी सही है आप के जीवन मे संतान सुख नही है। उन्होने ज्योतिषी को बताया कि मेरी तीन बेटियां है। तो ज्योतिषी ने बड़ी हैरत और दया से उनको देखा और चला गया तब से वे कुछ खिन्न और उदास रहने लगे और मन ही मन घुटने लगे इसी बीच उनका सम्पर्क पडोस मे रहने वाले जयप्रकाश चक्रवर्ती के परिवार से हो गया जिनके दो संुदर बेटियां और एक बेटा था उन्हांेने चक्रवती बेटे की नौकरी भी लगवा दी थी दोनों घरों के सदस्यों का एक-दूसरे के घरों मे आना-जाना था श्रीमती राजखोवा को शक था कि राजखोवा के चक्रवर्ती की बेटियों से नाजायज संबध है। इस बात को लेकर अक्सर पति-पत्नी में झगड़ा होता था ऐसे ही एक अवसर पर पुतुल देवी बिफर पड़ी क्या तुम सोचते हो कि मेरी बेटियों के पिता तुम ही हो इस मर्माहित सवाल ने उनके जीवन के प्रति आस्थाओं और मान्यताओं को चकनाचूर कर दिया इस सवाल का जवाब जानने के लिये उन्होंने दिल्ली और कलकत्ता के विशेषज्ञों से अपनी पुसंत्व की जांच करवाई जांच मे विशेषज्ञों ने बताया कि आप मे बच्चा पैदा करने की क्षमता नही है। और आप युवावास्था मे भी किसी औरत को शिशु प्रदान करने मे असमर्थ थे अतः उनको ज्योतिषी और अपनी पत्नी की बात पर विश्वास करने पर बाध्य होना पड़ा इसका मतलब साफ था कि उनकी पत्नी ने उनके साथ विश्वासघात किया था ऐसा विश्वासघात जो किसी आदमी को पागल बनाने के लिये काफी होता है। तभी एक ऐसी घटना घट गई जिसने उनके घातक इरादों को और मजबूत कर दिया और उन्होंने अपनी पत्नी और तीनो बेटियों की जघन्य हत्या करने का फैसला ले लिया दरअसल उन्होंने अपनी मंझली बेटी जोनाली उर्फ लूना और छोटी बेटी भान्तु उर्फ रूपलेखा को घर के रसोइये उमेश वैश्य के साथ संभोगरत अवस्था में देख लिया था उन्होने तत्काल तो कुछ नही किया लेकिन एक घातक हत्याकांड की योजना बना ली जिसकी किसी ने कल्पना भी नही की थी 2 फरवरी 1970 को वे रिटायर्ड हो गये उस समय उनकी पत्नी पुतुल देवी और और बड़ी लड़की निर्माला उनके साथ रह रही थी और छोटी बेटियां जोनाला और रूपलेखा अपने मौसा श्री बरदा शर्मा के साथ रहकर गोहाटी मे पढ रही थी उन्होने अपने ध्रूवी वाले बंगले मे नौकरो से दो गढढे खुदवाये उन्होने उमेश को एक हजार रूपयों का लालच देकर उसे पटाया और 10 फरवरी 1070 सरस्ती पूजा की रात अपने रसोइया उमेश के साथ मिलकर अपनी सोती हुयी पत्नी और बेटी के सिरो पर लोहे की छड़ के प्रहार द्वारा उनकी हत्या कर दी और उनके शव को लान मे खुदे एक गढ्ढे मे दफना दिया उन्होंने 25 फरवरी को अपने साढू को फोन करके अपनी बेटियो को ध्रुवी भेजने की जिद की उसी शाम वे बस स्टैण्ड से बेटियों को खुद घर लाये और उसी रात उन्होने उमेश की मदद से दोनों बेटियों की सोते समय सर पर लोहे की छड़ के वार से हत्या कर दी और उनकी लाशों को भी उसी तरह लान के दूसरे गढढे मे दफना दिया साढू द्वारा कराई गुमशुदा लड़कियांे की तलाश के संदर्भ में 25 जुलाई को सिलगुड़ी के सेवाक होटल में  राजखोवा खोजे गये 1 अगस्त को उन्होंने हत्या की बात कबूली लाॅन के गढ्ढों की खुदाइ्र्र में प्रत्येक गढढे से दो-दो कंकाल और अंय वस्तुयें निकली 11 अगस्त को उमेश और 12 अगस्त को राजखोवा गिरफ्तार कर लिये गये 5 मई 1973 को गोहाटी के सेशन जज वी एन हंसारिया ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई उमेश बरी कर दिया गया 6 अगस्त 1974 को गोहाटी हाईकोर्ट ने अपने फैसले मे भी राजखोवा की फांसी की सजा बरकरार रखी और उमेश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई राजखोवा ने हार ना मान कर सुप्रीम कोर्ट मे अपील की जो खरिज हो गई और 14 फरवरी, 1976 को राजखोवा को फांसी दे दी गई कानून की निगाह मे भले ही यह केस समाप्त हो गया हो और उसने अपना फर्ज पूरा कर लिया हो लेकिन नाजायज संबधों और कत्ल की जो दास्तान हजारांे साल से चली आ रही है। वह ना रूकी है और ना रूकेगी राजखोवा का कसूर इतना था कि वे नियति के क्रुर मजाक के शिकार हो गये पुंसत्व विहीन होना उनकी इच्छा नही बल्कि बदकिस्मती थी यह ठीक है। कि कानून किसी इंसान को दूसरे इंसान की जान लेने का हक नही देता है किन्तु पत्नी के विश्वासघात और बेटियों की चरित्रहीनता पर वह उन पतिताओं को क्या सजा देता यह कानून भी नही बता सकता है। धर्मशास्त्रों मे ऐसी महिलाओं की सजा का विधान है। पत्नी और बेटियों की चरित्रहीनता से उत्पन्न भारी हीनभावना, तनाव और अपमान ने उन्हें यह गुनाह करने को मजबूर किया एक ऐसा अपमान जिसने सरल, उदार, देशभक्त, संवेदनशाील और स्वतंत्रता सेनानी राजखोवा को मुजरिम बना दिया अपने गुनाह का उन्हें पूरा अहसास था अपने गुनाह की सजा खुद को देने के लिये उन्होंने दो बार आत्महत्या का प्रयास भी किया था, चरित्रहीनता चाहे पुरूष में हो या स्त्री मे अक्षभ्य अपराध है। इसंानियत की निगाह मे राजखोवा बेगुनाह है कोई फैसला केवल इसीलिये सही नही हो जाता कि उसे हाईकोर्ट ने दिया है। सरकार को उन्हें आजीवन कारावास की सजा देनी चाहिये थी इसांन कितना ही सुहृदय, संतुलित क्यों ना हो विशेष परिस्थितियों मे पड़ कर क्रूर और असंतुलित हो ही जाता है। वह उसी से बेइन्तिहा नफरत करने लगता है। जिनसे वह बेपनाह प्यार करता था ऐसा ही कुछ हुआ राजखोवा के साथ।