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विवाह समय निधारण के नाड़ी सूत्र
January 12, 2020 • संकलित-डी.एस. परिहार

विवाह समय निर्धारण के नाड़ी विशोंत्तरी दशा के सूत्रो पर लिखा गया यह हिन्दी में लिखा गया संभवतः प्रथम लेख है। भारतीय ज्योतिष चतुः पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम मोक्ष के सिद्धान्त पर  आधारित है। यह चारों पुरूषार्थ जंमपत्री के  तीन तीन भावों के आधीन आतक है इसके साथ ही यह कुछ ग्रह विशेष तथा राशियों के भी कारक होते हैं। 
1. धर्म- यह जमंाक के 1, 5, 9 भावों अग्नि राशियों तथा गुरू और सूर्य से संबधित होता है।
2. अर्थ-  इसका संबध 2.6. 12 भावों, पृथ्वी तत्व की राशियों व तथा शनि, गुरू, बुध, तथा  सूर्य ग्रहों से होता है।
3. काम- यह 3, 7, 1, भावांे, शुक्र, मंगल ग्रहों और वायु तत्व की राशियों के अन्र्तगत आता है।
4. मोक्ष- इसका संबध 4, 8, 12 भावों, जल राशियों तथा केतु, गुरू ग्रहों से होता है।
 ज्योतिष मे पुरूष जातक मे शुक्र पत्नी का कारक है और स्त्री जातक मे मंगल मतांतर से गुरू विवाह का कारक ग्रह है ज्योतिष मे विशोंत्तरी दशा घटनाओं के समय ज्ञान का सर्वोंत्तम साधन है किन्तु अनुभव से पता चलता है कि जातक ग्रन्थों मे वर्णित विवाह के समय निर्धारण के सामान्य विशोंत्तरी सूत्र लागू नही होते हैं। कुछ ज्योतिष ग्रन्थों मे विशोंत्तरी दशा के विचित्र व रहस्यमय सूत्र प्राप्त होते हैं। जो संस्थान द्वारा प्रयोग करने पर अनुभवसिद्ध और प्राणामिक सिद्ध हुये हैं।
1. द्वितीयेश, सप्तमेश, चतुर्थेश, दशमेश या दशमेश ग्रहों की महादशा या अन्र्तदशा मे जातक का विवाह होता है।
2. 2, 4, 7, 9 भाव मे बैठे ग्रहों की अन्र्तदशा दशा।
3. चन्द्र, शुक्र, नवम भाव के ग्रह की अन्र्तदशा में।
4. सप्तमेश युत शुक्र की अन्र्तदशा में।
5. सप्तमेश के नक्षत्र मे गये ग्रह की अन्र्तदशा दशा।
6. सप्तमेश युत राहू या केतु या शुक्र युत राहू या सप्तम भाव मे गये राहू की अन्र्तदशा मे विवाह होता है।
 प्रसिद्ध जैमिनी ज्योतिषी संजय राठ ने अपनी पुस्तक ‘दि क्रक्स आॅफ वैदिक एस्ट्रोलाॅजी’ में नवंाश चक्र के आधार पर विशोंत्तरी दशा के निम्न सूत्र बताये हैं।
1. नवंाश लग्न मे गये ग्रह या उसे देखने वाले ग्रह या नवंाश लग्नेश से युत या लग्नेश को देखने या नवांश लग्न या लग्नेश पर शुभ अर्गला रखने वाले ग्रह की महादशा मे विवाह होगा।
2. सप्तमेश युत ग्रह या सप्तमेश पर शुभ अर्गला रखने वाले ग्रह की अन्र्तदशा मे विवाह होगा।
3 सप्तम भाव से त्रिकोण (3, 7, 11) मे बैठे ग्रह या उपरोक्त भावेश ग्रह की प्रत्यन्तर दशा मे विवाह होगा इसके अतिरिक्त उन्होने उपपद या सप्तम पद में गये ग्रह या इनके स्वामियों की भी अन्र्तदशा या प्रत्यन्तर दशाा मे विवाह होना बताया है।
  नाड़ी ग्रन्थों के सूत्र
देवेरलम के सूत्र-
1. द्वितीयेश या सप्तमेश जिस राशि मे जाय उस राशि स्वामी ग्रह की अन्र्तदशा या प्रत्यन्तरदशा में।
2. द्वितीयेश या सप्तमेश नवांश मे जिस राशि मे जाय उस राशि स्वामी ग्रह की अन्र्तदशा या प्रत्यन्तरदशा में।
3. शुक्र या चन्द्र से सप्तमेश की अन्र्तदशा या प्रत्यन्तरदशा में।
4. शुक्र या सप्तमेश से युत ग्रहों के नक्षत्र मे गये ग्रह की अन्र्तदशा या प्रत्यन्तरदशा में। 
5. द्वितीयेश या सप्तमेश नवांश मे जिस राशि मे जाय वह राशि स्वामी ग्रह जमंाक मे जिस राशि मे हो उस राशि स्वामी ग्रह जाये अन्र्तदशा या प्रत्यन्तरदशा में।
6. महादशानाथ या शुक्र से 7 वें भाव मे बैठे ग्रह की अन्र्तदशा।
 भारत के राष्ट्रपति ़द्वारा सम्मानित राजस्थान के ज्योतिषी स्व कल्याण दत्त शर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘अनुभूत योगावली’  मे विवाह हेतु विशोंत्तरी दशा के निम्न सूत्र बताये हैं।
1. नवमेश या दशमेश की अन्त्र्तदशा मे विवाह होगा
2. सप्तमस्थ ग्रह की अन्र्तदशा में।
3. बली शुक्र या चन्द्र की अन्र्तदशा में।
4. शुक्र से सप्तमेश या शुक्र से सातवेे भाव में गये ग्रह की अन्र्त दशा मे विवाह होगा।
श्री आर. संथानम द्वारा संपादित और अनुवादित नाड़ी ग्रन्थ ‘डाक्ट्रिन आॅफ शुक्र नाड़ी के भाग्य भाव के अघ्ययन के दौरान मुझे पितृ मरण समय के विशांेंत्तराी दशा के कुछ विचित्र सूत्र मिले जो जो लग्न, चन्द्र लग्न व पितृ कारक सूर्य पर आधारित थे यह सूत्र सामान्य है। और प्रत्यंेक भाव व कारक पर लागू किये जा सकते हैं। उन सूत्रो पर शोध करके 16 सूत्र प्राप्त हुये हैं। अनुभव मे यह 75 प्रतिशत तक सही परिणाम देते है। इन्हें मैं अपने पूज्य पूर्वजों के समर्पित करते हुये ‘परिहार सूत्र’ का सम्मान दे रहा हूँ।
1. लग्न से सप्तमेश की महादशा मे चन्द्रमा से सप्तमेश की अन्त्र्तदशा या चन्द्र से सप्तमेश की महादशा मे लग्न से सप्तमेश की अन्त्र्तदशा।
2. सप्तमेेश से सप्तमभाव मे गये ग्रह का अन्तर।
3. लग्नेश की महादशा मे लग्नस्थ ग्रह का अंतर।
4. सप्तमेश की महादशा मे लाभेश, लग्नेश या पंचमेश का अंतर।
5. शुक्र या मंगल से 7 वें भाव मेगये ग्रह या सप्तमेश की महादशा मे शुक्र से पंचमेश, नवमेश या लाभेश का अंतर।
6. चन्द्रमा से सप्तमेश की महादशा मे शुक्र से सप्तमेश की अन्त्र्तदशा। 
7. चन्द्रमा से सप्तमस्थ ग्रहों की महादशा या सप्तमेश की महादशा मे मे शुक्र से सप्तमस्थ ग्रह की अन्त्र्तदशा
8. चन्द्रमा से लाभेश की महादशा मे शुक्र के लाभेश का अंतर या शुक्र से लाभेश की महादशा मे चन्द्रमा के लाभेश का अंतर।
9. शुक्र से सप्तमेश की महादशा मे लग्न से लाभेश का अंतर।
9. शुक्र से सप्तमेश की महादशा मे लग्न से लाभेश का अंतर।
10. शुक्र से सप्तमस्थ ग्रहों की महादशा मे लग्नेश से सप्तमस्थ  ग्रहों का अंतर।
11. लग्न से सप्तमस्थ ग्रहों की महादशा मे शुक्र या गुरू से सप्तमस्थ ग्रहों का अंतर।
12. लग्नेश की महादशा मे शुक्र से सप्तमस्थ ग्रहों का अंतर।
13. चन्द्रमा से सप्तमेश की महादशा मे शुक्र से युत ग्रह का अंतर।
14. लग्न से सप्तमेश की महादशा मे शुक्र से सप्तमेश का अंतर।
15. चन्द्र से सप्तमस्थ ग्रहों की महादशा मे शुक्र से सप्तमेश का अंतर।
16. लग्न से सप्तमेश की दशाा मे लग्न का अंतर।
 उपरोक्त सूत्र शुक्र नाड़ी मे महर्षि शुक्र द्वारा प्रतिपिादित भाग्य भाव के सूत्रों पर ही अधारित है। इन सूत्रों के ज्ञान का  असली का श्रेय महर्षि शुक्र को ही जाता है।