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व्यक्ति कांटों को फूल बना सकता है
January 17, 2020 • पंकज वैश्य

जरा सोचिए, कहाँ मगध राज दरबार में खड़ा एक निर्बल और अपमानित ब्राहमण और कहाँ वहीं ब्राहमण, जो भारतीय इतिहास के स्वर्ण काल का अग्रदूत और प्रणेता, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य की रीढ़ बन गया, ‘चाणक्य’!    
रेल के पहले दर्जे से मात्र रंग के आधार पर फेंका गया एक वकील और वहीं व्यक्तित्व जिसके चुम्बकत्व में लाखों भारतीयों को अंग्रेजों के दमनकारी हथियारों के सम्मुख निहत्था खड़ा कर दिया, गांधी’! रास्ता चाहे जो भी हो, इतिहास इन्हें चाहे नायक बनाये या नहीं, वास्तविक जीवन से उठाये गये ये दोनों चरित्र कहीं न कहीं अपमान की अग्नि में सुलग रहे थे, अपमान की इसी अग्नि को धैर्य, परिश्रम और सतत् संघर्श की भट्टी में डालकर विजय के महायज्ञ को लगन रूपी ईधन से प्रज्ज्वलित करके ऐसे ही चरित्रों में अन्ततः नये इतिहास की रचना। सम्मान, सुख या किसी आधारभूत आवष्यकता से वंचित होने को यदि लगन बनाकर सफलता के निरन्तर प्रयास किये जायें तो असफलता की संभावना षून्य हो जाती है और संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सफलता एक स्वप्न है और असफलता यथार्थ, मानव इतिहास की महानतम उपलब्धियाँ यथार्थजनित पीड़ा को जीतकर स्वप्न विजित करने की प्रक्रिया है। लेकिन आज यह मिथक बदल गया क्योंकि मेरे अनुसार, ्कष्ट, पीड़ा को अपनाकर व्यक्ति कांटों को फूल बना सकता है। जीवन में सुख ढूंढ़ने वाले संतोषी व्यक्तियों से सदैव बचना चाहिए, क्योंकि एक संतोषी व्यक्ति उस पत्थर के समान हैं, जिसमें योग्यता का भार तो है, परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने की क्षमता नहीं है। भारतीय वेदान्त को आधुनिक युग में उचित संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते है संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं प्रतिष्ठा दिलवाने वाले स्वामी विवेकानन्द के हृदय की पीड़ा ही थी, जिसने पश्चिमी परतन्त्रता में जकड़ी और तत्कालीन पश्चिम आयातित इतिहास में जंगली और असभ्य समझी जाने वाली हिन्दू सभ्यता हिन्दू सभ्यता के दर्शन को शिकांगो के विश्व धर्म सम्मेलन में सिरमौर बनाया था, यह स्वामी विवेकानन्द जी का कष्ट ही था, जो पहले छवि सुधार के उद्देश्य रूप में अनुवादित हुआ और अन्ततः सांस्कृतिक आत्म-सम्मान के प्रतीक के रूप में परिलक्षित हो गया। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते...’ की मूल भावना के विपरीत श्रीमद्भगवतगीता में एक स्थान पर कर्म, अकर्म और विकर्म को परिभाषित किया गया है, जो कर्म किसी आकांक्षा या फल की इच्छा के बिना किया जाता है, वह अकर्म है, कर्म के अन्दर उद्देश्य निहित होना आवश्यक है। उद्देश्य या लक्ष्य से दूरी ही पीड़ी है और वही लक्ष्य प्राप्ति की लगन भी है। विपत्ति काल में हृदय को कवलित करने वाले विचार लम्बे समय तक मस्तिष्क पटल पर अंकित रहते हैं। वंचित होने की टीस भी एक शाश्वत विपत्ति है। आवश्यकता है सकारात्मक प्रेरणा ग्रहण करने की। पहली फ्लाइंग मशीन का अविष्कार करने वाले राइट बन्धु अपने पहले तीन अभियानों में असफल रहे और व्यंग्यवाणों का निशाना भी बने, परन्तु इस व्यंग्य वाणों को प्रेरणा बनाकर अन्ततः उन्हें सफलता भी मिली। सच तो यह है कि कष्ट के बिना लक्ष्य प्राप्ति भी संभव नहीं है और यदि कष्ट की अगन को परिमार्जित करके सतता का ईधन बना लिया जाये, तो सफलता अवश्यम्भावी है, आपके सपनों को सच होते देर नहीं होगी।